शनिवार, 21 फ़रवरी 2009

सखी

मेरी सखी
हँसती-गुनगुनाती रहती
सारा दिन
सपने सजाती
अपनी शादी के
मुझसे करती
ढेरों बातें
शादी के बाद
उसकी हँसी खो गई
उसकी चूडियों की खनखनाहट में
उसका गुनगुनाना
पायल की झंकार में मिल गया
अब वो मिलती है मुझे
सिर्फ़ मेरे सपने में
हाथ बढ़ाकर पकड़ना चाहती हूँ उसे
हाथ में आती है
उसकी पायल ,चूड़ी ,मंगलसूत्र
वो नहीं मिलती
जाने कहाँ कहीं खो गई
एक बड़े घर की बहू बनकर रह गई मेरी सखी
शादी के बाद
औरतें सखी नहीं होती
शादी के बाद
औरतों की सखियाँ
कहीं खो जाती हैं ।

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