रविवार, 8 फ़रवरी 2009

चलो मीठा सा गीत कोई गुनगुनाएं

जाके बीते ज़माने में आज फिर से /चलो बचपन की यादों को बीन लायें /भूलकर ज़िंदगी की परेशानियाँ /चलो मीठा सा गीत कोई गुनगुनाएं /.......चलो पलटें पुरानी किताबों को आज /बिछड़े यारों की फोटो को फिर से देखें ,/बंद हैं घर के बक्से में बरसों से जो /उन चिठ्ठियों और कार्डों को फिर से देखें ,/अपनी बगिया के फूलों को पानी डालें /छत पे जाकर कबूतर को दाना खिलाएं ,/चलो मीठा सा गीत कोई गुनगुनाएं ... ... /दम घुटता रहा साँस फूलती रही /पिछले दरवाजे को कब से खोला नहीं ,/रात में आँसू बनकर बहती है जो /बात दिल में रही कभी बोला नहीं ,/खोलकर आज दिल के दरवाजों को /ताजी हवा के झोकों में झूम जायें, /चलो मीठा सा गीत कोई गुनगुनाएं ... ।

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर!! पुरानी यादें फिर ताजा कर दी।

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  2. Muktiji
    Wonderful poem.
    Can u not try to convert this poem into an audio version and present again here?
    Good luck!
    -Harshad Jangla
    Atlanta, USA

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