बुधवार, 4 फ़रवरी 2009

संस्कृति के पहरुए

संस्कृति रक्षा के नाम पर /युवतियों का सरेआम अपमान करने वालों /पहले भारतीय संस्कृति को जानो /तुम प्रेम का विरोध करते हो /तो जाओ अभिज्ञान शाकुंतलम पढ़ो/जो विश्व -प्रसिद्ध /उन्मुक्त प्रेम की गाथा है /'अमरुक -शतक 'पढ़ो /जिसका एक-एक छंद /प्रेमरस से भरी रसभरी है /और जो संस्कृत काव्यशास्त्रियों की /आँख का तारा है/ मदिरा का विरोध करते हो /तो पहले वेद पढ़ो /जहाँ सोम की देवता के रूप में /स्तुति की गई है /और .../शंकर भगवान् को /भंग -धतूरा चढ़ाना छोड़ दो /जाओ चुनाव लड़ो/सरकार बनाओ /और कर दो शराब -बंदी /पूरे राज्य में /सारे ठेकों के लाइसेंस /जब्त कर लो /जो भी करो /इस लोकतान्त्रिक देश में /सब जायज है /अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर /पर इसकी सीमा /तुम्हारी नाक के आगे/ख़त्म हो जाती है/... ...प्रेम तो मानव की स्वाभाविक प्रवृत्ति है /संस्कृति रक्षा के नाम पर /इस पावन भावना को /मत रोको /याद रखो /प्रेम करने वाले /आतंकवादी ,बलात्कारी ,या हत्यारे /नहीं होते /और इससे पहले /कि तुम्हारे हमलों कि प्रतिक्रिया में /वे ऐसे हो जाएँ /प्रेम पर पहरा लगना /बंद कर दो।

1 टिप्पणी:

  1. अच्छा लिखा है आपने । भाव, विचार, भाषा और प्रखर अभिव्यक्ति के कारण आपका शब्द संसार विशेष प्रभाव छोड़ने में समथॆ है ।

    मैने अपने ब्लाग पर एक लेख लिखा है-आत्मविश्वास के सहारे जीतें जिंदगी की जंग-समय हो तो पढें और कमेंट भी दें-

    http://www.ashokvichar.blogspot.com

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