आवाज़ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
आवाज़ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 1 मई 2010

सोचकर तो देखें

कभी सोचते हैं हम
फाइव-स्टार होटलों में
छप्पन-भोग खाने से पहले
कि कितने ही लोग
एक जून रोटी के बगैर
तड़प-तड़प के मरते हैं ।

कभी सोचते हैं हम
आलीशान मालों में
कीमती कपड़े खरीदने से पहले
कि कितने बच्चे और बूढे
फटे -चीथड़े लपेटे
गर्मी में झुलसते
सर्दी में ठिठुरते हैं ।

कभी सोचते हैं हम
अपनी बड़ी-बड़ी गाड़ियों को
सैकड़ों लीटर पानी से
नहलाने से पहले
कि इसी देश के किसी कोने में
लोग बूँद-बूँद पानी को तरसते हैं ।

सोचते हैं हम कि
अकेले हमारे सोचने से
क्या फर्क पड़ेगा
कभी सोचकर तो देखें
एक बार तो मन ठिठकेगा...

(यह कविता पिछले वर्ष मजदूर दिवस पर लिखी थी...आज भी कुछ नहीं बदला है...और आगे भी शायद नहीं बदलेगा...पर, क्या हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे ??)

शनिवार, 2 जनवरी 2010

चुप्पी

हम तब भी नहीं बोले थे
जब एक टीचर ने
बुलाया था उसे स्टाफ़रूम में
अकेले
और कुत्सित मानसिकता से
सहलायी थी उसकी पीठ
डरी-सहमी वह
रोती रही
सिसकती रही
...
हम तब भी नहीं बोले
जब बीच युनिवर्सिटी में
खींचा गया था
उसका दुपट्टा
और वह
हाथों से सीने को ढँके
लौटी हॉस्टल
फिर वापस कभी
युनिवर्सिटी नहीं गयी
...
हम तब भी नहीं बोले
जब तरक्की के लिये
माँगी गयी उसकी देह
वह नहीं बिकी
एक नौकरी छोड़ी
दूसरी छोड़ी
तीसरी छोड़ी
और फिर बिक गयी
...
हम तब भी नहीं बोले
जब रुचिका ने की आत्महत्या
जेसिका, प्रियदर्शिनी मट्टू
मार दी गयी
उनके हत्यारे
घूमते रहे
खुलेआम
...
हम आज भी नहीं बोले
जब इसी ब्लॉगजगत में
सरेआम एक औरत का
होता रहा
शाब्दिक बलात्कार
और हम चुप रहे
हम चुप रहे
चुप... ...

बुधवार, 16 दिसंबर 2009

सन्नाटा

चारों तरफ़ सन्नाटा है
हालाँकि शोरगुल भी है
नारे भी हैं
चीखती-चिल्लाती आवाज़ें भी हैं
फिर भी सन्नाटा है
इसलिये कि
आवाज़ें नहीं उठतीं सबके लिये
उठती हैं सिर्फ़ अपने लिये,
इसलिये कि
कोई आवाज़
नहीं उठती उनके खिलाफ़
जिन्होंने खरीद लिया है
सभी की आवाज़ों को
अलग-अलग तरीकों से,
हम सभी की आवाज़ें
बिक गयी हैं
किसी न किसी के हाथों
हम सभी हो गये हैं गूँगे
और बेआवाज़
इसीलिये चारों तरफ़
सन्नाटा ही सन्नाटा है.