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गुरुवार, 9 जुलाई 2009

एक छोटे शहर की लड़की (१)

एक छोटे शहर की लड़की
आँखों में हज़ारों सपने लिए
आती है महानगर में,
अकेली लड़ती है
अपने अस्तित्व को
मिटने से बचाने के लिए,
एक पहचान हो उसकी भी
बस इतना चाहती है,
और इसके लिए
रोज़
एक नया गुर
सीखती जाती है।

मंगलवार, 7 जुलाई 2009

पहचान


इस भीड़ में चेहरे हैं बहुत
पर कोई पहचाना
चेहरा नहीं मिलता.
चेहरों के पीछे चेहरें हैं
और उसके भी पीछे चेहरे
अपनों के बीच भी कोई
अपना नहीं मिलता.
क्यूँ अपनी पहचान को
छिपाते हैं यहाँ लोग
जो जहाँ जैसा है क्यूँ
वैसा नहीं मिलता.