रविवार, 6 सितंबर 2026

अंतहीन तलाश

(अक्सर मन एक ऐसी अनजानी खोज पर निकल जाता है, जिसका कोई निश्चित सिरा नहीं होता। यह कविता उसी तलाश, सन्नाटे और भीतर के उस ख़ालीपन के बारे में है, जो अधूरा नहीं बल्कि अपने आप में मुकम्मल है।)
किसी ओर से आती है किसी की आवाज़, दीवारों से टकराकर लौट जाती है
जाने किसकी खोज में है मन, दृष्टि क्षितिज पर टिकती नहीं।

हवाएँ लाती हैं 
किसी अनकहे शहर की महक,
पर पैरों के नीचे की ज़मीन 
कहीं रुकती नहीं।
यह जो ख़ालीपन है, 
यह कोई अधूरापन नहीं,
बस तलाश जारी है उसकी, 
जो आँखों से दिखती नहीं।

शुक्रवार, 28 अगस्त 2026

सीढ़ी और नींव

मैं चल रही थी
अपनी राह
पथरीला रास्ता
ऊपर धूप
पाँव में छाले
कुछ लोग दिखे
एक आस जगी

लोग आए
दूर-दूर से आए
धुँधलके और उजाले से आए
मैंने उन्हें दिखाई मंज़िल
बहुत दूर
खड़ी चढ़ाई
सीधी ऊँचाई पर मंज़िल

लोग ठिठके 
नहीं हिचके
पाँव मेरे हाथों पर रखे
फिर कंधे पर
उचककर चढ़ गए

वे मंज़िल पर हैं
ऊँचाई पर
मैं चल रही हूँ

एक भरम है

कि उनकी ऊँचाई
मेरे नीचे होने से ज़्यादा ऊँची नहीं
वे भले मुझे सीढ़ी बना गए
नींव तो मैं ही हूँ
ज़मीन पर
ज़मीन में
ज़मीन से जुड़ी

बुधवार, 26 अगस्त 2026

मार्च की बारिश

झरते हुए पत्ते दरअस्ल 
रोते हुए पेड़ों के आँसू हैं 
बदलते हुए मौसमों की बेरुखी पर  
रो पड़े हैं सारे पेड़।  

(रात की बारिश से उपजे कुछ शब्द 
या यूँ कहें कि दिल की गीली मिट्टी में 
उग आये कुछ शब्द )

प्यार, मोह और असमंजस


मैं प्यार करती हूँ तुमसे
जब छोड़कर जाना चाहोगे, जाने दूँगी, 
पर प्यार करती रहूँगी
किसी और को चाहूँगी, तब भी चाहूँगी तुम्हें,
तुम्हारे बगैर भी जिऊंगी, तुम्हें याद करते हुए। 

पर तुम्हें...मुझसे मोह है,
इसलिए तुम मुझे कभी छोड़ न पाओगे,
तुम जुड़े रहोगे मेरे साथ यूँ ही 
जब हमारे बीच प्यार नहीं रह जाएगा तब भी,
और मैं न रहूँ..., तो जाने क्या होगा?

कभी सोचती हूँ मेरा प्यार बेहतर है 
कभी मन कहता है तुम्हारा मोह भला।

गुरुवार, 20 अगस्त 2026

पल भर का साथ

कभी उस साथी को हमसफ़र मत समझना जिसका घोंसला कहीं और हो 

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दूर देश दाने की तलाश में 
भटक रहा
थका हारा पक्षी
 
सुस्ता लेता है
 
किसी पेड़ की डाल पर यदि छाँव देख
तो वह पेड़
, उस पक्षी का घर नहीं हो जाता

पक्षी जाएगा वहीं पर 
कई दिनों की मेहनत से बनाए हुए घोंसले में जहाँ
भूख से राह देख रहे कुछ नन्हे चूज़े
 
चोंच फैलाए बैठे हैं घण्टों से

पेड़ का गुमान तोड़ने को बस इतनी ही बात काफ़ी है कि वह खुद उड़कर 
जा नहीं सकता
उस पक्षी के पीछे  
जिसके एक पल ठहर जाने को वह
जीवन भर का साथ समझ बैठा था।
 

-मुक्ति