मैं चल रही थी
अपनी राह
पथरीला रास्ता
ऊपर धूप
पाँव में छाले
कुछ लोग दिखे
एक आस जगी
लोग आए
दूर-दूर से आए
धुँधलके और उजाले से आए
मैंने उन्हें दिखाई मंज़िल
बहुत दूर
खड़ी चढ़ाई
सीधी ऊँचाई पर मंज़िल
लोग ठिठके
नहीं हिचके
पाँव मेरे हाथों पर रखे
फिर कंधे पर
उचककर चढ़ गए
वे मंज़िल पर हैं
ऊँचाई पर
मैं चल रही हूँ
एक भरम है
कि उनकी ऊँचाई
मेरे नीचे होने से ज़्यादा ऊँची नहीं
वे भले मुझे सीढ़ी बना गए
नींव तो मैं ही हूँ
ज़मीन पर
ज़मीन में
ज़मीन से जुड़ी
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