मंगलवार, 7 जुलाई 2009

पहचान


इस भीड़ में चेहरे हैं बहुत
पर कोई पहचाना
चेहरा नहीं मिलता.
चेहरों के पीछे चेहरें हैं
और उसके भी पीछे चेहरे
अपनों के बीच भी कोई
अपना नहीं मिलता.
क्यूँ अपनी पहचान को
छिपाते हैं यहाँ लोग
जो जहाँ जैसा है क्यूँ
वैसा नहीं मिलता.

3 टिप्‍पणियां:

  1. aapne waqt ki nabz par haath rakh diya hai....

    afsos.............

    sachmuch ek chehre pe kai chehre nazar aane lage hain
    ACHHI KAVITA
    BADHAAI !

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  2. पहचान छुपाते लोगो मे तो खुद की पहचान भी खो जाती है.

    सार्थक प्रश्न उकेरती अच्छी कविता

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