सोमवार, 11 मई 2009

माँ ... ...!


जिंदगी यूँ ही चलती जाती है
बिना किसी सहारे के
जैसे तैरता हो कोई पत्ता
समुद्र की लहरों पे
आती है जब-जब भी
तूफ़ान की आहट
एक शब्द आता है
होठों पर
माँ ...
कट जाते हैं रास्ते
कठिन हों कितने ही
ठोकर लगती है
तो याद आती है
माँ ...
माँ की आँखें दिए की लौ सी हैं
माँ की बातें गीता जैसी हैं
माँ है तो सारी खुशियाँ हैं
बिन माँ के हर खुशी अधूरी है
लौट सकती हो तो लौट आओ
माँ ...
तुम बिन जिंदगी अधूरी है ...















3 टिप्‍पणियां:

  1. मातृ दिवस पर समस्त मातृ-शक्तियों को नमन एवं हार्दिक शुभकामनाऐं.

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  2. सुंदर रचना। इस संवेदना की कविता के लिये बधाई।

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