(अक्सर मन एक ऐसी अनजानी खोज पर निकल जाता है, जिसका कोई निश्चित सिरा नहीं होता। यह कविता उसी तलाश, सन्नाटे और भीतर के उस ख़ालीपन के बारे में है, जो अधूरा नहीं बल्कि अपने आप में मुकम्मल है।)
किसी ओर से आती है किसी की आवाज़, दीवारों से टकराकर लौट जाती है
जाने किसकी खोज में है मन, दृष्टि क्षितिज पर टिकती नहीं।
हवाएँ लाती हैं
किसी अनकहे शहर की महक,
पर पैरों के नीचे की ज़मीन
कहीं रुकती नहीं।
यह जो ख़ालीपन है,
यह कोई अधूरापन नहीं,
बस तलाश जारी है उसकी,
जो आँखों से दिखती नहीं।
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