शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009

औरत होने का सुख

भीगी आँखों के /धुंधले परदे के पीछे से /मैंने देखा था /उसकी भी आँखें /गीली थीं /पर वो ठहरा मर्द /रोता कैसे ?/ तो पी गया वो /अपने सारे आँसू/पर मैं रोई /रो -रोकर /अपने ख़त्म होते रिश्ते के /दर्द को मैंने /आँसुओं में बहा दिया /और ...पहली बार /अपने औरत होने का सुख /महसूस किया /रोना ,फूट-फूटकर रोना /यही तो औरतें / आज़ादी से कर पाती हैं /और शायद / इसी कारण /बड़ा से बड़ा दर्द / सह जाती हैं।

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सही कहा आपने बहुत अच्छी रचना

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  2. NahiN, ye zaruri nahiN..Ek sher aur ek Ghazal khaaqsaar ki padheN..Aur aap kaheNgi ki samvedna to samvedna hi hoti hai...

    दिल में गर दर्द भरा है कभी तो छलकेगा
    अश्क़ आँखों के छिपाना ये कोई बात हुई

    ग़ज़ल
    बाहर से ठहरा दिखता हूँ भीतर हरदम चलता हूँ
    इक रोशन लम्हे की खातिर सदियों-सदियों जलता हूँ

    आवाज़ों में ढूँढोगे तो मुझको कभी न पाओगे
    सन्नाटे को सुन पाओ तो मैं हर घर में मिलता हूँ

    दौरे-नफरत के साए में प्यार करें वो लोग भी हैं
    जिनके बीच में जाकर लगता मैं आकाश से उतरा हूँ

    कितने दिलों ने अपने आँसू मेरी आँख में डाल दिए
    कोई आँसू ठहर न जाए यूँ मैं खुल कर रोता हूँ
    -संजय ग्रोवर

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  3. कविता मार्मिक है...परन्तु यह दुःख आने वाली पीढियों को न सहना पड़े, हर संवेदनशील व्यक्ति की यही कामना है.

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  4. 'मर्द को दर्द नही होता', यही सुनते आए हैं फिल्मों में! जाने कैसे आंसुओं को पीकर इस तथ्य को प्रमाणित किया जाता गया है।

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