रविवार, 11 जनवरी 2009

काश

काश मैं उड़ पाती / तो उड़ जाती खुले गगन में दूर तक /चली जाती इंसानों की दुनिया से परे/ वहां, जहाँ कोई भी न हो/सिर्फ़ मैं /और शून्य.

4 टिप्‍पणियां:

  1. फ़ेमिनिस्ट ब्लोग को इतना भीतरी रंग क्यों दे दिया आपने. कुछ झकझक, चकाचक रंग दें. अक्षर कुछ धुंधले दिख रहे हैं.
    एक अच्छी कविता के लिये बधाई, और
    नये वर्ष की शुभकामनायें.

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  2. Please see all this on male's eyes.
    Thanks for interest !
    arvind
    http://indianscifiarvind.blogspot.com/2008/09/blog-post.html

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