मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

अपनी राह पर

मेरी किस्मत में
नहीं थी चाँदी की चम्मच
और मखमली कालीन
थे पथरीले काँटों से भरे रास्ते
जिन पर झाड़-झंखाड़ को हटाकर
ख़ुद ही चलना था मुझे

मेरी किस्मत में नहीं थी
माँ की ममता की छाँव
और पिता के प्यार का साया
दुःख और मुश्किलों की धूप में
तपते रहना और जलना था मुझे

पर ...मुझे
किस्मत से कोई शिकायत नहीं
आख़िर ...उसने ही तो मुझे
ख़ुद अपनी राह बनाना सिखाया
धीरज रखना और दुःख सहना सिखाया

ठोकरें खा-खाकर
सख्त़ और सख्त़ बनती जा रही हूँ मैं
ख़ुद अपनी राह पर
बिना किसी सहारे चलती जा रही हूँ मैं ।

रविवार, 5 अप्रैल 2009

मेरे सपनों में घर

मेरे सपनों में
आता है जो घर वो सपनों का घर नहीं
मेरा अपना घर है ,
वो घर, जिसे पिताजी ने बड़े अरमानों से बनाया था
हम भाई -बहनों ने
उसका कोना-कोना सजाया था,

वो घर, जिसकी खिड़की से दिखती थी बँसवारी
और दूर तक फैले खेत
जिसकी छत पर चाँदनी रातों में हम करते थे घंटों बातें,
छूट गया वो घर मुझसे
पिताजी के जाने के बाद,
रह गई उस घर की, उन खेतों -खलिहानों की याद
अब वो घर आता है अक्सर मेरे सपनों में,
और आँसुओं से भीग जाता है मेरा तकिया

... ... तीन साल हुए घर गए
सोचती हूँ कब और कैसे वहाँ जाऊँगी
पिताजी को बरामदे में चारपाई पर बैठा न पाकर
ख़ुद को कैसे सँभाल पाऊँगी?

गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

तुम्हारे जाने के बाद

फूल सभी मुरझा गए
सूरज बुझ गया
चिडियाँ गूँगी हो गयीं
सन्नाटा फैल गया सब ओर 
दिशाएँ सूनी हो गयीं
रंगों से भरा ये संसार
कब हो गया फीका -फीका सा
मुझे कुछ भी नहीं याद
कि देखी हैं कब बहारें मैंने
तुम्हारे जाने के बाद
 ... ... ...

तुम्हारे होने से
फैल जाती थी
हवाओं में महक और
गुनगुना उठती थीं पेड़ों की पत्तियाँ
सारा संसार लगता था
अपना -अपना सा
जगता था अपने अस्तित्व की
पूर्णता का अहसास
आज अधूरी हो गई हूँ मैं
तुम्हारे जाने के बाद ।

प्रश्न

औरत के प्रश्न /समाज को /विचलित क्यों कर देते हैं /क्यों लगता है कि इससे /चरमरा जाएगा /समाज का ढांचा /और परिवार नाम की संस्था /ध्वस्त हो जायेगी /समाज और परिवार को /बेहतर बनाने की ज़िम्मेदारी /अगर औरत की है /तो क्यों खामोश है वो /प्रश्न क्यों नहीं करती /जो जैसा है ,ठीक है /यह मानकर /चुप क्यों रह जाती है ।

रविवार, 22 मार्च 2009

विकल्प

उसने चाही थी स्वतंत्रता
किया संघर्ष
ख़ुद से ,समाज से ,परिवार से
आज वह
स्वतन्त्र है
स्वावलंबी है
पर सुखी नहीं
पूरी तरह सुरक्षित नहीं
क्योंकि वह औरत है
अपने सीमित विकल्पों के साथ ।

मंगलवार, 17 मार्च 2009

धूल

धूल साथी है
मेहनतकश मजदूरों की, गरीबों की,
बड़े घरों की शानदार बैठकों में
धूल नहीं होती ,
उसे रगड़-रगड़कर
साफ़ कर दिया जाता है,

धूल में होते हैं
अनेक रोगाणु -कीटाणु,
जैसे शहर की झोपड़पट्टियों में पलते
कीड़ों जैसे गंदे-बिलबिलाते लोग
नाक बहाते, थूक गिराते बच्चे,


झोपड़पट्टियाँ...
शानदार शहरों की धूल हैं
इन्हें रगड़-रगड़कर
साफ़ कर देना चाहिए ।

शुक्रवार, 13 मार्च 2009

लड़कियाँ और कुकुरमुत्ते

लड़कियाँ गाँधीजी के तीन बंदरों का
जीवंत प्रतिरूप हैं
न देखती हैं ,न सुनती हैं ,न कहती हैं
लड़कियाँ पाली नहीं जाती
कूड़े के ढेर पर पलने वाले कुकुरमुत्तों की तरह
ख़ुद ही पलती और बढती रहती हैं।

लड़कियाँ बहनें ,बेटियाँ ,पत्नी और माँ हैं
लड़कियाँ ख़ुद कहाँ हैं?

कोई नहीं सोचता
कि लड़कियाँ सोच सकती हैं
इसलिए उनकी कोई पसंद, कोई ख़्वाहिश नहीं होती।

लड़कियों को बताया जाता है
कि वे सोचने के लिए नहीं करने के लिए हैं
और इसीलिए
लड़कियाँ करती रहती हैं
झाडू ,पोछा ,बर्तन,खाना
जो भी उनसे कहा जाता है।
शादी से पहले पिता के घर
शादी के बाद पति के यहाँ बस करती ही रहती हैं,
न देखती हैं ,न सुनती हैं ,न कहती हैं
कूड़े के ढेर पर उगने वाले कुकुरमुत्तों की तरह
उगती ,पलती ,बढती और मरती रहती हैं। ... ...