शुक्रवार, 13 मार्च 2009

लड़कियाँ और कुकुरमुत्ते

लड़कियाँ गाँधीजी के तीन बंदरों का
जीवंत प्रतिरूप हैं
न देखती हैं ,न सुनती हैं ,न कहती हैं
लड़कियाँ पाली नहीं जाती
कूड़े के ढेर पर पलने वाले कुकुरमुत्तों की तरह
ख़ुद ही पलती और बढती रहती हैं।

लड़कियाँ बहनें ,बेटियाँ ,पत्नी और माँ हैं
लड़कियाँ ख़ुद कहाँ हैं?

कोई नहीं सोचता
कि लड़कियाँ सोच सकती हैं
इसलिए उनकी कोई पसंद, कोई ख़्वाहिश नहीं होती।

लड़कियों को बताया जाता है
कि वे सोचने के लिए नहीं करने के लिए हैं
और इसीलिए
लड़कियाँ करती रहती हैं
झाडू ,पोछा ,बर्तन,खाना
जो भी उनसे कहा जाता है।
शादी से पहले पिता के घर
शादी के बाद पति के यहाँ बस करती ही रहती हैं,
न देखती हैं ,न सुनती हैं ,न कहती हैं
कूड़े के ढेर पर उगने वाले कुकुरमुत्तों की तरह
उगती ,पलती ,बढती और मरती रहती हैं। ... ...

1 टिप्पणी:

  1. ज्यादातर ऐसा हो रहा हो, ऐसी बात नहीं.

    लड़कियां लड़ रही हैं
    लड़कियां रच रही हैं दुनिया को
    सब कुछ संवार रही हैं लड़कियां
    कोई नहीं पहुंच पाता
    उनकी उड़ानों के आखिरी सिरे तक
    लड़कियां
    हर समय की रंग हैं
    लड़कियां
    हर सुबह की लौ हैं
    लड़कियां वक्त की,
    शब्द की,
    अर्थ की,
    गूंज-अनुगूंज की,
    सोनल चुप्पियों
    और पूरी प्रकृति की
    सबसे खूबसूरत
    इबारत हैं
    ऐसा कभी न कहना
    किसी लड़की बारे में.

    .....आपकी रचना ने विचलित कर दिया. अर्थ चाहे जो भी, ध्वनि असहनीय रही.

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