रविवार, 5 अप्रैल 2009

मेरे सपनों में घर

मेरे सपनों में
आता है जो घर वो सपनों का घर नहीं
मेरा अपना घर है ,
वो घर, जिसे पिताजी ने बड़े अरमानों से बनाया था
हम भाई -बहनों ने
उसका कोना-कोना सजाया था,

वो घर, जिसकी खिड़की से दिखती थी बँसवारी
और दूर तक फैले खेत
जिसकी छत पर चाँदनी रातों में हम करते थे घंटों बातें,
छूट गया वो घर मुझसे
पिताजी के जाने के बाद,
रह गई उस घर की, उन खेतों -खलिहानों की याद
अब वो घर आता है अक्सर मेरे सपनों में,
और आँसुओं से भीग जाता है मेरा तकिया

... ... तीन साल हुए घर गए
सोचती हूँ कब और कैसे वहाँ जाऊँगी
पिताजी को बरामदे में चारपाई पर बैठा न पाकर
ख़ुद को कैसे सँभाल पाऊँगी?

1 टिप्पणी:

  1. बहुत मार्मिक रचना है।यादे कभी नही भूलती।बहुत अच्छी रचना है।बधई।

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