सोमवार, 27 अप्रैल 2009

ओस

गीली रात में उतरती है
फूलों पर ओस
हौले से छूकर उसे मुस्कुराती है
पंखुरी बिठा लेती है
अपनी पीठ पर उसे
और धीरे-धीरे-झूला झुलाती है
प्रेम का पावन रूप
पल्लवित होता है
ऐसी ही निःशब्द विभावरी में
जब पेड़ों के झुरमुट से
चाँदनी झर-झर के आती है

4 टिप्‍पणियां:

  1. कम शब्दों में बेहतरीन प्रस्तुति। वाह।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
    कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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