बुधवार, 6 जनवरी 2010

पूर्ण समर्पण

प्रिय, तुमने कहा था मुझसे
कि तुम मुझको
पाना चाहते हो
पूरी तरह से
तब मैं
तुम्हारे "पूरी तरह से" का
मतलब नहीं समझ पायी थी
अब जान गयी हूँ
मैं तैयार हूँ
कर दूँगी मैं
पूर्ण समर्पण
दे दूँगी तुमको ये तन
इसमें क्या रखा है
कर सकती हूँ
तुम पर अर्पण
सौ-सौ जीवन
क्योंकि मैंने
तुमको चाहा था
और चाहती हूँ
पूरी तरह से
पर नहीं था मालूम मुझे
कि तुमने मुझको
आधा ही चाहा था
और पूरी तरह से
तब चाहोगे
जब तुम मुझको
मेरी देह सहित
"पूरी तरह" से पा जाओगे.

12 टिप्‍पणियां:

  1. मुझको
    पाना चाहते हो
    पूरी तरह से

    Jydatar yahi purnta apurnta ko janam deti hai ....Puri tharah paane ke chakar me bahut door ho jate hai log...

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  2. देह और नेह अलग कब हैं?
    सुन्दर रचना

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  3. आह, क्यों न समझ पाया पुरुष इस द्वंद्व को अब तक ?
    गहन अनुभूति ,आशय, अभिप्राय और आकांक्षा से अनुप्राणित - परिपाक हुयी
    प्रभावपूर्ण रचना!

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  4. कितनी आसानी से सहज ही कह देती हैं आप गूढ़ बातें !
    सुन्दर रचना ! आभार ।

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  5. किसी स्त्री को पुरुष द्वारा या पुरुष को स्त्री द्वारा पूर्ण 'पा' लेना क्या आसान है?
    बातें हैं बातों का क्या?
    बस निर्मल प्रेम अजस्र बहता रहे।

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  6. अरे वाह क्या बात आराधना दीदी , सच में आप तो लेखो से बहुत बढ़िया कवितायें लिखती हैं । आपकी इस रचना में गजब का भाव और समर्पण दिखा , बहुत खूब ।

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  7. .. देर से ही सही ..
    .. नए साल की शुभकामनाएं ..
    कविता पर ..
    '' साधो, सहज समाधि भली ''
    'बेनामी-टेढ़ापन' नहीं दिखा , अच्छा लगा ..
    ......... आभार ,,,

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  8. पूर्ण-समर्पण का अपना आनंद है। जिन्होने जाना उन्होने तो यहां तक कहा कि पूर्ण से पूर्ण को निकाल दो तब भी पूर्ण शेष रहता है-पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते। अच्छी लगी आपकी रचना।

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  9. हर नारी 'अमृता' होती है क्या?
    बहुत सुन्दर रचना है.

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