(नये साल की पूर्व संध्या पर वर्ष की अन्तिम पोस्ट)
तुझमें जो आग है
उस आग को तू जलने दे
अपने सीने में उसे
धीरे-धीरे पलने दे...
भभक कर जलेगी
तो राख बन जायेगी
धुयें के साथ यूँ ही
आप से सुलगने दे...
उस पर आँसू न बहा
अश्क के छींटे मत दे
न अपने दिल को
इस आग में पिघलने दे...
.......
देख,
इक दिन ये आग
ज्वालामुखी बन जायेगी
हर सूखी, सड़ी-गली
चीज़ को जलायेगी
होता है ध्वंस तो फिर
एक बार हो जाने दे
बेकार चीज़ों को
इस आग में जल जाने दे
उनकी तू फ़िक्र न कर
राख पर जो रोते हैं
ध्वंस की राख में
सृजन के बीज छिपे होते हैं
16 टिप्पणियाँ:
इतना सीधा जे एन यू में शोध करती औरत लिखे - ये हमें कुबूल नहीं है.
आप में दम है, हिन्दी को धनी बनाइए. ये सब गजल वालों के लिए छोड दीजिए.
बहुत खूबसूरत रचना..बड़े ही सुंदर भाव को पिरोया है आपने अपनी इस कविता में जो बहुत ही अच्छा लगा..धन्यवाद!!!
देख,
इक दिन ये आग
ज्वालामुखी बन जायेगी
हर सूखी, सड़ी-गली
चीज़ को जलायेगी
होता है ध्वंस तो फिर
एक बार हो जाने दे
बेकार चीज़ों को
इस आग में जल जाने दे
muktji ...
Lag raha hai mere dil ki baat aapne hi kah di ...kia baat hai...
ध्वंस की राख में
सृजन के बीज छिपे होते हैं
YAHI SOCH SOCH KE TO HAR BAAR MAHABHARAT machti hai kabhi maan me kabhi jeevan me....mach jane do aaj ran ke bheri bhaj jaane do.....
@बेनामी,
आपकी आलोचना सर-आँखों पर. लेकिन मेरे लिये भाषा,शैली और विधा कोई बन्धन नहीं... मेरे मन में जो भी आता है उसे लिख देती हूँ. आपने आलोचना की इसके लिये आभारी हूँ. पर एक शिकायत भी है कि आपको गज़ल और हिन्दी के बारे में ऐसा नहीं कहना चाहिये क्योंकि मेरे मन में उर्दू और गज़ल दोनों के लिये बहुत सम्मान है. गज़ल की सीधे-सादे शब्दों में गम्भीर से गम्भीर बात कह देने की ताकत उसे एक लोकप्रिय विधा बनाती है और उर्दू के शब्दों के प्रयोग से हिन्दी समृद्ध होती है.
मुक्ति जी !
आपने मुझे(कविता पर टिप्पणी के दौरान ) आशावादी होने की
बात कही थी, वैसे मैं निराशावादी नहीं हूँ पर इतना स्पष्ट आशावाद
जो आपकी कविता में है , मेरे लिए भी अनुकरणीय है ..
कविता की आख़िरी पंक्तियों ने तो गजब का प्रभाव पैदा किया है ..
'' ध्वंस की राख में
सृजन के बीज छिपे होते हैं ''
सुन्दर कविता के लिए आभार ...
'' बेनामी '' की बातों के अनुसार आप जे एन यू में शोधरत हैं , क्या वाकही
ऐसा है ? , संयोग से हम भी यहीं रिसर्च में खोपड़ी खपा रहे हैं !
वैसे बेनामी ( नाम देते तो क्या बुरा था ? ) की बातों से असहमत हूँ क्योंकि
सीधा लिखना सबसे टेढ़ा काम है ..
'' सीधी रेखा खींचना सबसे टेढ़ा काम है ''
--- हजारी प्रसाद द्विवेदी
और , जे एन यू टेढ़ा लिखने वालों की जगह है , ऐसा कहना तर्कसंगत नहीं है ..
बहुत उम्दा रचना!!
आपका जबाब अच्छा और सधा हुआ है.
यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि आप हिंदी में सार्थक लेखन कर रहे हैं।
हिन्दी के प्रसार एवं प्रचार में आपका योगदान सराहनीय है.
मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं.
निवेदन है कि नए लोगों को जोड़ें एवं पुरानों को प्रोत्साहित करें - यही हिंदी की सच्ची सेवा है।
एक नया हिंदी चिट्ठा किसी नए व्यक्ति से भी शुरू करवाएँ और हिंदी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें।
आपका साधुवाद!!
शुभकामनाएँ!
समीर लाल
उड़न तश्तरी
दुष्यन्त कुमार की वह मशहूर पंक्ति - हो कहीं पर आग लेकिन आग जलनी चाहिए।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
"ध्वंस की राख में
सृजन के बीज छिपे होते हैं "
-
यह उग्रता , यह उद्वेग! ॐ शांति ॐ शांति.... शांति देवि....
नव विहान की प्रतीक्षा पर विध्वंस की बातें! नहीं देवि नहीं .....
माना कि हर विध्वंस नव सृजन की आस लिए आता है
..मगर विध्वंस नव सृजन का सगुन तो नहीं यह तो है एक असगुन ही
हम सृजन की बात करें ..केवल सृजन की ....अभी भी जीवन शेष है कुछ सृजन भी शेष है
अभी वक्त नहीं आया क़यामत का ......
और हाँ हरप्रश्न -पृच्छा उत्तरित ही हो यह कोई जरूरी तो नहीं !
सुन्दर भावाभिव्यक्ति.
कोलकाता मे बिरला कला अकादमी मे हमारे प्रदेश की ख्यात चित्रकार (चित्रकारा) डा. सुनीता वर्मा की प्रदर्शनी आज और कल के लिये लगी है. कोलकाता के ब्लागर भाई समय निकाल कर सुनीता जी के पेंटींग्स का अवलोकन करे.
bhut khub , jari rakhen .
भभक कर जलेगी
तो राख बन जायेगी
धुयें के साथ यूँ ही
आप से सुलगने दे...
उस पर आँसू न बहा
अश्क के छींटे मत दे
न अपने दिल को
इस आग में पिघलने दे...
वाह .....!!
गज़ब के भाव हैं और जिस करीने से आपने सजाया है रूह तृप्त हो गई .....!!
कृपया बेनामी टिप्पणियों को स्थान न दें .....!!
"उनकी तू फ़िक्र न कर
राख पर जो रोते हैं
ध्वंस की राख में
सृजन के बीज छिपे होते हैं "
कविता ने गहरी आश्वस्ति दी | बेहतरीन रचना का आभार | सहज लिखना सहज नहीं - सच है यह ! आप लिख रहीं हैं तो कैसी अथ-इति !
देख,
इक दिन ये आग
ज्वालामुखी बन जायेगी
हर सूखी, सड़ी-गली
चीज़ को जलायेगी
ये महज़ कुछ अलफ़ाज़ नहीं हैं
(ये मात्र कुछ शब्द नहीं है)
एक आह्वान भी तो है .....
एक बलंद आवाज़ भी तो है
"ध्वंस की राख में सृजन के बीज छिपे होते हैं.."
हाँ !
ये सीधा लिखना ही तो है.....
सीधा-सीधा सच पर आ जाना ,,,
बिना कोई हेर-फेर किये
अदीबों / साहित्यकारों का
यही तो फ़र्ज़ / कर्तव्य है
और उसे आप बखूबी निभा रही हैं ....
और....
आलोचना / तनक़ीद को आप सहज स्वीकारती हैं..
अच्छा है
यही तो अस्ल मार्ग-दर्शन / राहनुमाई है .
अभिवादन .
नव-वर्ष की ढेरों मंगल कामनाएं . . .
ध्वंस की राख में
सृजन के बीज छिपे होते हैं.
--सुंदर भाव संजोती. नई पीढ़ी को उर्जा देती, सशक्त रचना के लिए ढेर सारी बधाइयाँ...
नववर्ष मंगलमय हो।
'ध्वंस की राख में
सृजन के बीज छिपे होते हैं '
वाह! बहुत ही खूबसूरत रचना है यह.
नववर्ष की ढेरों शुभकामनाओं के साथ अल्पना
सुन्दर कवित, संयत टिप्पणी। बधाई!
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