शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

अस्तित्व

मैं सोई थी
मीठे सपनों में
खोई थी
उस गहरी नींद से
जगा दिया
मैंने
अपने अस्तित्व को
तुममें मिला दिया था
तुमने
ठोकर लगाकर मुझे
मेरे अस्तित्व का
एहसास करा दिया.

10 टिप्‍पणियां:

  1. अस्तित्व अस्तित्व मे विलीन कर दिजिए ठोकर नही लग सकती.
    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

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  2. सादर वन्दे
    तुमने
    ठोकर लगाकर मुझे
    मेरे अस्तित्व का
    एहसास करा दिया.
    बहुत सुन्दर रचना!
    रत्नेश त्रिपाठी

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  3. सुर्खरू होता है इन्सां ठोकरें खाने के बाद.

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  4. अजब गजब हैं ग्राही ...
    अस्तित्व को अस्तित्व में विलीन करने का
    उपदेश भी दे देते हैं !
    कृपया सुलाने वाले उपदेश से बचा ही जाय ..
    '' जागृति '' की कविता अच्छी लगी .... आभार ...

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  5. अस्तित्व को अस्तित्व में विलीन कर देने से निश्चित ही प्रेम एक उदात्त स्तर पर पहुँच जाता है और किसी भी ठोकर की गुंजाइश नहीं रह जाती. इस दृष्टि से यह बात ठीक है. पर प्रेम उस स्तर तक तब पहुँचता है, जब दोनों तरफ़ से ऐसा किया जाय. किसी एक तरफ़ से होने पर धोखे की गुन्जाइश रह जाती है. ख़ैर... ठोकर किसी को भी, कभी भी लग सकती है. ज़रूरत होती है, उसको सकारात्मक ढंग से लेने की और हिम्मत बनाये रखने की.
    ...और ठोकर लगने के डर से कोई प्रेम करना भी नहीं छोड़ सकता और प्रेम में समर्पण करना भी...

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  6. कविता और वक्तव्य दोनों को संयुक्त करके देख रहा हूँ ।
    आभार ।

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  7. मन खुश हो गया -कविता और टिप्पणी से!

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