सोमवार, 21 सितंबर 2009

बादल के टुकड़े

मुट्ठी में
आकाश पकड़ना चाहा था
कुछ बादल के टुकड़े
मेरे हाथ लगे
हम अम्बर को देख
तरसते रहते हैं
ये बादल दिन-रात
बरसते रहते हैं

4 टिप्‍पणियां:

  1. वाह-वाह क्या बात है, लाजवाब रचना। आपके शब्दो का चयन बहुत ही बेहतरिन है। इस लाजवाब रचना के लिए बहुत-बहुत बधाई

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  2. बेहतरीन
    बाद्लो का बरसना अम्बर को देख

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