शनिवार, 19 सितंबर 2009

घर

शाम ढलते ही
पंछी लौटते हैं 
अपने नीड़
लोग अपने घरों को
बसों और ट्रेनों में 
बढ़ जाती है भीड़
पर वो क्या करें 
जिनका घर हर साल ही 
बसता-उजड़ता है
यमुना की बाढ़ के साथ

6 टिप्‍पणियां:

  1. विस्थापन की पीड़ा वही जानता है जो इस से गुजरता है ..मेरी कविता की एक पंक्ति है .. रेल की खिड़की से दिखाई देने वाले पेड़ /नही जान सकते / उखड़े हुए पेड़ों का दर्द .. अच्छी कविता लिख रही हो मुक्ति और मेहनत करो -शरद कोकास

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  2. घर लौटने के लिए एक घर होना ज़रूरी है.
    वे क्या घर लौटेंगे जो बेघर हो चुके है

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  3. उम्दा , सुन्दर कविता। आपके शब्दो का चयन लाजवाब है। बहुत-बहुत बधाई.....................

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