मंगलवार, 11 अगस्त 2009

अबकी सावन में
नहीं आयी हथेलियों से
मेहंदी की खुशबू
नहीं बरसे बादल
झूले नहीं पड़े पेड़ों पर
अबकी सावन में
नहीं जा सकी घर
रोजी-रोटी के चक्कर में

2 टिप्‍पणियां:

  1. उत्सव स्थान के मुहताज नहीं होते।

    जहाँ थीं वहीं मना लेतीं। गाछ न हो तो छत पर झूला। मेंहदी न हो तो टैटू।
    बदरा न बरसें तो नैन ही सही। हम तो लेख लिखते ही कई बार रो लेते हैं।

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  2. इंसान को हर हाल में मस्त रहना चाहिए
    आज़ादी की 62वीं सालगिरह की हार्दिक शुभकामनाएं। इस सुअवसर पर मेरे ब्लोग की प्रथम वर्षगांठ है। आप लोगों के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष मिले सहयोग एवं प्रोत्साहन के लिए मैं आपकी आभारी हूं। प्रथम वर्षगांठ पर मेरे ब्लोग पर पधार मुझे कृतार्थ करें। शुभ कामनाओं के साथ-
    रचना गौड़ ‘भारती

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