मंगलवार, 18 अगस्त 2009

ज़िन्दगी फिर से

चारों ओर फैली है धुँध सी
फ़ीका चाँद, चाँदनी धुँधली
ज़िन्दगी के रंग धुल गये सारे
दुःखों की बदली में छुप गये तारे,
टूटे-फूटे अरमानों की
फूस बटोर
उम्मीदों की चिंगारी को ढूँढ़
हौसलों की आग जला ली जाये,
आओ!
ज़िंदगी फिर से
जी ली जाये.

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खुब। शानदार रचना के लिए बधाई ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. मुक्ति जी
    सादर वन्दे!
    सुन्दर रचना. बधाई हो !
    रत्नेश त्रिपाठी

    उत्तर देंहटाएं
  3. आओ फिर से जिंदगी जी ली जाये ...शुभ हो ...शुभकामनाएं ..!!

    उत्तर देंहटाएं