शनिवार, 25 दिसम्बर 2010

हँसती हुयी औरत दुखी नहीं होती

सुनो, एक कविता लिखो
या यूँ ही कुछ पंक्तियाँ
जिन्हें कविता कहा जा सके
और इसी बहाने याद रखा जाए

लिखो तुम औरतों के बारे में
उनके दुःख-दर्द और परेशानियाँ
उनकी समस्याओं के बारे में
पर उनकी खुशियों के बारे में कभी मत लिखो

उनकी सहनशीलता, उदारता और
ममता के बारे में लिखो
उनके सपनों, आकांक्षाओं और इच्छाओं के बारे में
कभी मत लिखो.

बता दो दुनिया को औरतों के दमन के बारे में
उन पर हुए अत्याचारों को लिखो
दमन से आज़ादी के संघर्ष की गाथा
कभी मत लिखो

लिखो औरतों के आँसुओं के बारे में
उनके सीने में पलने वाली पीड़ा
पर उनकी खुशी के बारे में
कभी मत लिखो

औरत के आँसू ये बताते हैं
कि वो कितनी असहाय है
त्याग और तपस्या की मूर्ति
उसे ये आँसू पी लेने चाहिए

इन दुःख दर्दों को
मान लेना चाहिए अपनी नियति
हँसने के अपने अधिकारों के बारे में
नहीं सोचना चाहिए

कि हँसती है जो औरत खिलखिलाकर
दुखी नहीं होती
इसलिए औरत नहीं होती 

31 टिप्पणियाँ:

वन्दना ने कहा…

इन दुःख दर्दों को
मान लेना चाहिए अपनी नियति
हँसने के अपने अधिकारों के बारे में
नहीं सोचना चाहिए

कि हँसती है जो औरत खिलखिलाकर
दुखी नहीं होती
इसलिए औरत नहीं

सच कह रही हैं ये कोई नही देखता खिलखिलाहट के पीछे कितने आँसू छुपे हैं।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

इन दुःख दर्दों को
मान लेना चाहिए अपनी नियति
हँसने के अपने अधिकारों के बारे में
नहीं सोचना चाहिए

कि हँसती है जो औरत खिलखिलाकर
दुखी नहीं होती
इसलिए औरत नहीं

हर शब्द एक सच को लिए हुए ...झकझोर देने वाली कविता

nilesh mathur ने कहा…

कमाल की अभिव्यक्ति है, बेहतरीन!

mridula pradhan ने कहा…

bari bebaki ke saath likhi hui bahut achchi kavita.

boletobindas ने कहा…

आज तो दिल खुश हो गया। यही वो सवाल था जो जाने मैने कई बार महिलाओं से किया। मगर जवाब वही आप क्या जाने नारी के दुख का हाल आफ तो पुरुष ठहरे। तंग आ गया था इन जवाबो से। क्या कोई खुशी नहीं होती जो हम बांट सके। कोई खुशी नहीं होती किसी वंचित के जीवन में जिसके बारे में लिखा जाए। दुख है तो सुख है। हंसी है तो रोना है। जरुरी नहीं कि हर समय रोना ही रोया जाए।

H P SHARMA ने कहा…

vehatareen kavita, kataaksh bhee aur seekh bhee.

Kunwar Kusumesh ने कहा…

नारी-पीड़ा उकेरती सुन्दर काव्यमय प्रस्तुति.

muskan ने कहा…

बहुत ही सुंदर.

वाणी गीत ने कहा…

मैं कभी ना हंसती खिलखिलाकर
गर मुझको खबर होती ...
एक मुस्कराहट की ही कीमत है
हजार आंसूं !

अच्छा व्यंग्य किया है ...
मैंने पहले भी कहीं कमेन्ट में लिखा था ..
स्त्रियों की रोती आँखों को काँधे बहुत मिल जाते हैं , हंसने वाली स्त्रियों को माथे की त्योरियां !

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना कल मंगलवार 28 -12 -2010
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..


http://charchamanch.uchcharan.com/

anklet ने कहा…

nice aap bahot atchha likhti hai

रश्मि प्रभा... ने कहा…

लिखो औरतों के आँसुओं के बारे में
उनके सीने में पलने वाली पीड़ा
पर उनकी खुशी के बारे में
कभी मत लिखो
gr8

मोहिन्दर कुमार ने कहा…

कविता भाव अभिव्यक्ति के अतिरिक्त क्या है..और एक औरत भावों का भंडार है.. वह अकेली ही जिन जिन परिस्थियों से सामना कर सकती है उनका व्खान करते करते जीवन बीत जायेगा...
कभी कभी दुख या खुशी चेहरे पर नहीं आती.. शायद मन जज्व कर जाता है... और किसी ने सच ही कहा है..

"हजारों तरह के ये होते हैं आंसूं
कोई गम हो तो रोते हैं आंसूं
खुशी में भी आंखें भिगोते हैं आंसु
इन्हें जान सकता नहीं ये जमाना.... मैं खुश हूं मेरे आंसूओं पे न जाना... मैं तो दीवाना.. दीवाना"

Kailash C Sharma ने कहा…

कि हँसती है जो औरत खिलखिलाकर
दुखी नहीं होती
इसलिए औरत नहीं

नारी व्यथा का बहुत ही सटीक चित्रण..बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति

अनुपमा पाठक ने कहा…

व्यथा और नारी का चिर सम्बन्ध उजागर करती गहन रचना!

Dorothy ने कहा…

नारी जीवन की विडंबनाओं की गहन संवेदनाओं को उकेरती मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति. आभार.
सादर,
डोरोथी.

स्वप्निल कुमार 'आतिश' ने कहा…

yah kavita aurat ke aurat hone ke itihaas men hue her pher ko batati hai..... halanki kavita ke lahze ka itihas se koi lena dena nahi hai..lekin jo baaten ismen kahee gayee hain nischit taur par wahi hui hongi itihas men...aurat par hue atyachaaron ko jitna likha gaya hoga utna aazadi ke liye uske sangharsh ko nahi likha gaya hoga..... mujhe bahut hi jyada pasand aayi ye kavita...

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

badhiya vyangy.

Priya ने कहा…

great....afsos ye hai...ki zydatar mahila writers bhi peeda, durbalta aur ashaay hone ko hi likhti aai hain.....shukr hai ham youngester ka....jo traditional writing se hatkar sochte hain.

Good one

कविता रावत ने कहा…

इन दुःख दर्दों को
मान लेना चाहिए अपनी नियति
हँसने के अपने अधिकारों के बारे में
नहीं सोचना चाहिए

कि हँसती है जो औरत खिलखिलाकर
दुखी नहीं होती
इसलिए औरत नहीं
... dard ko khud jee lene ke baad hi itne gahri vyath vykt hoti hai...
..bahut maarmik prastuti

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

सुन्दर कविता के अलावा और कह ही क्या सकती हूं?
नये वर्ष की अनन्त-असीम शुभकामनाएं.

Arvind Mishra ने कहा…

यह कविता कुछ अवसाद सा तारी कर गयी मन पर ......

Dorothy ने कहा…

अनगिन आशीषों के आलोकवृ्त में
तय हो सफ़र इस नए बरस का
प्रभु के अनुग्रह के परिमल से
सुवासित हो हर पल जीवन का
मंगलमय कल्याणकारी नव वर्ष
करे आशीष वृ्ष्टि सुख समृद्धि
शांति उल्लास की
आप पर और आपके प्रियजनो पर.

आप को सपरिवार नव वर्ष २०११ की ढेरों शुभकामनाएं.
सादर,
डोरोथी.

अन्जान...... ने कहा…

औरत के आँसू ये बताते हैं
कि वो कितनी असहाय है
त्याग और तपस्या की मूर्ति
उसे ये आँसू पी लेने चाहिए

यही तो करती आई है आज तक औरत किन्तु अब इसे असहाय समझना बहुत बड़ी भूल होगी.. नारी की संवेदना का सटीक चित्रण किया है..साधुवाद..

आलोक अन्जान,
http://aapkejaanib.blogspot.com/

राजेश उत्‍साही ने कहा…

पता है कि इस खिलखिलाहट के पीछे गहन संवदेना है,दर्द है।
*
बहुत दिनों बाद आपकी एक सशक्‍त कविता पढ़ने को मिली,जो केवल बौद्धिक जुगाली भर नहीं है।

Harman ने कहा…

bahut hi khoob..
happy new year..
Please visit my blog..

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Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

ek pyari rachna....:)
lekin sachchai is se itar hai, jaruri nahi har aurat dukhi ho...jaise har mard khush nahi hota...:)

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

now follow ur blogs.........to barabar aayenge..:D

mukti ने कहा…

मुकेश जी,
मैंने अपनी इस कविता में यही दिखाया है कि लोग औरतों के दुखों को तो चित्रित करते हैं.
पर उसकी खुशियों, आकांक्षाओं और इच्छाओं का जिक्र नहीं करते. जो औरत अपने कष्टों को हँसते-हँसते सहती है, उसे वो दुखी ही नहीं
मानते. दुःख तो औरत-मर्द दोनों को होता है, पर औरतों के ही आँसुओं का वर्णन ज्यादा देखने को मिलता है.
वस्तुतः मेरा प्रश्न उस मानसिकता की ओर उँगली उठाता है जिसके अंतर्गत हमारा समाज ये मानकर चलता है कि 'मर्द को आँसू नहीं
बहाने चाहिए' और औरतों को खिलाखिलाकर नहीं हंसना चाहिए.
बस फर्क सिर्फ़ इतना है कि मैं एक पक्ष रखती हूँ, दूसरा पक्ष तो अपने आप सामने आ जाता है. जिस तरह से हम हँसने वाली औरतों
को पसंद नहीं करते उसी तरह रोने वाले मर्दों को अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता.ये हमारे समाज की मानसिकता है. हाँ, अपवाद भी
हैं, पर अधिकतर यही होता है.

महेन ने कहा…

वीरांगना हो जाती है?

महेन ने कहा…

वीरांगना हो जाती है?