शनिवार, 11 दिसंबर 2010

अभिनेत्री- रघुवीर सहाय की एक कविता

अभिनेत्री जब बंध जाती है
अपने अभिनय की शैली से
तो चीख उसे दयनीय बनाती है
पुरुषों से कुछ ज्यादा
औ' हँसी उसे पुरुषों से ज़्यादा बनावटी
यह इस समाज में है औरत की विडम्बना
हर बार उसे मरना होता है
टूटा हुआ बचाती है
वह अपने भीतर टूटफूट के
बदले नया रचाती है
पर देखो उसके चेहरे पर
कैसी थकान है यह फैली
हँसने रोने को कहती है
उससे पुरुषों की प्रिय शैली
इन दिनों से कुछ ज़्यादा
औरत का चेहरा कह सकता है
पर क्या उसकी ऐसी आज़ादी
पुरुष कभी सह सकता है
वह उसे हँसाता रहता है
वह उसे सताता रहता है
वह अपने सस्ते रंगमंच पर
उसे खेलाता रहता है
औरत का चेहरा है उदास
पर वह करती है अट्टहास
उसके भीतर की एक गरज
अनमनी चीख बन जाती है
वह दे सकती थी कभी कभी
अपने संग्रह से गुप्तदान
पर दया सरेबाज़ार वही
खुद एक भीख बन जाती है.

14 टिप्‍पणियां:

  1. विचारणीय कविता प्रस्तुत कि है ...आभार इसे यहाँ पढवाने का ..

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  2. पहली बार पढ़ रहा हूँ रघुवीर सहाय की कविता..
    बहुत गहरी कविता है.

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  3. अभी जनपक्ष, सबद, कारवां और कई अन्य ब्लॉग पर रघुवीर सहाय के बारे में काफी कुछ पढने को है... तो जो वहां कहा है वही यहाँ भी कहूँगा

    http://jantakapaksh.blogspot.com/2010/12/blog-post_09.html

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  4. औरत का चेहरा है उदास
    पर वह करती है अट्टहास

    ओह..कैसे लिख जाते हैं..इतना संवेदनशील .....जनपक्ष पर भी रघुवीर जी की स्त्री-विषयक कविताएँ, बेहद प्रभावशाली लगीं....

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  5. mukti...raghuveer ji ne ek ek pankti gehrayi se gadhi hai...rachna prabhaawshali hai..man ko chhuti hai..

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  6. आज १७-१२-२०१० को आपकी यह रचना जिसमे रागुवीर सही जी कि कविता है , चर्चामंच में रखी है.. आप वहाँ अपने विचारों से अनुग्रहित कीजियेगा .. http://charchamanch.blogspot.com ..आपका शुक्रिया

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  7. बहुत ही खुब लिखा है आपने......आभार....मेरा ब्लाग"काव्य कल्पना" at http://satyamshivam95.blogspot.com/ जिस पर हर गुरुवार को रचना प्रकाशित नई रचना है "प्रभु तुमको तो आकर" साथ ही मेरी कविता हर सोमवार और शुक्रवार "हिन्दी साहित्य मंच" at www.hindisahityamanch.com पर प्रकाशित..........आप आये और मेरा मार्गदर्शन करे..धन्यवाद

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  8. पुरुषों से कुछ ज्यादा
    औ' हँसी उसे पुरुषों से ज़्यादा बनावटी
    यह इस समाज में है औरत की विडम्बना
    हर बार उसे मरना होता है
    टूटा हुआ बचाती है
    वह अपने भीतर टूटफूट के
    बदले नया रचाती है
    .... रघुवीर सहाय जी ने औरत के दर्द को बहुत गहराई से महसूस कर रची है यह कविता ...
    प्रभावपूर्ण कविता के प्रस्तुति के लिए आपका आभार

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  9. sanvedansheel rachna..........achchha laga..:)

    sayad isliye aapne isko post bhi kiya. hai na........

    share karne ke liye dhanyawad...

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  10. i could not trace it in KAVITA KOSH .Thanks GOD TO FIND IN YOUR BLOG.I FIND A LOT OF OTHER POEMS NOTED BY ME IN HAND SCRIPT NOT AVAILABLE IN KAVITA KOSH

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  11. aaradhana i have taken the poem on my timeline with image.THANKS

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