बृहस्पतिवार, 30 सितम्बर 2010

रूसी कवि "येव्गेनी येव्तुशेंको" की एक कविता

हे भगवान !
कितने झुक गए हैं स्त्री के कंधे
मेरी उँगलियाँ धँस जाती हैं
शरीर में उसके भूखे, नंगे
और आँखें उस अनजाने लिंग की
चमक उठीं
वह स्त्री है अंततः
यह जानकर धमक उठीं
      फिर उन अधमुंदी आँखों में
      कोहरा सा छाया
      सुर्ख अलाव की तेज अगन का
      भभका आया
      हे राम मेरे ! औरत को चाहिए
      कितना कम
      बस इतना ही
      कि उसे औरत माने हम

(भाषांतर: अनिल जनविजय, "स्त्री: मुक्ति का सपना" पुस्तक से साभार )

26 टिप्पणियाँ:

Bhawna 'SATHI' ने कहा…

ha orat ko chahiye kya ki use bs ek orat mana jaye,us se alg kuch v man kr aap us ke jine ka haq v chhin lete ho.to kya khe vo......

boletobindas ने कहा…

कई बार कुछ कहते नहीं बनता है। सच में हे भगवान..........

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति ...

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

बहुत अच्छी रचना प्रस्तुत की है...
पढ़वाने के लिए शुक्रिया.

Arvind Mishra ने कहा…

ऊँ ऊँ ..रसन तो आती नहीं -एक काम कीजिये इस का कोई अंगरेजी अनुवाद हो तो क्या लगा सकेंगीं प्लीज !

रचना दीक्षित ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति. पढ़वाने के लिए शुक्रिया.

शरद कोकास ने कहा…

यह एक अच्छी कविता है । कवि का अंतर्निहित दुख यह भी है कि स्त्री को इतना कम भी अप्राप्य है ।

Anjana (Gudia) ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति ...

Vidushi ने कहा…

Kam chahiye isiliye nahi milta...kaash k hum bhi zidd karna seekh jate...

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 5-10 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

http://charchamanch.blogspot.com/

आशीष/ ਆਸ਼ੀਸ਼ / ASHISH ने कहा…

हमारे लेवल से ऊपर की बात है...
आशीष
--
प्रायश्चित

Pankaj Trivedi ने कहा…

बहुत ही अलग विचार देने वाली कविता देने के लिएँ कवियत्री और अनुवादक का धन्यवाद

संतोष कुमार ने कहा…

बहुत सुंदर रचना !
पढवाने के लिए धन्यवाद !

वन्दना ने कहा…

हे राम मेरे ! औरत को चाहिए
कितना कम
बस इतना ही
कि उसे औरत माने हम

बस यही तो एक चाहत होती है और उसे बहुत सुन्दरता से पिरोया है…………पढवाने के लिये आभार्।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

http://charchamanch.blogspot.com/2010/10/19-297.html

यहाँ भी आयें .

इमरान अंसारी ने कहा…

बहुत खुबसूरत कविता और उतना ही खुबसूरत अनुवाद |

कभी फुर्सत में हमारे ब्लॉग पर भी आयिए-
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एक गुज़ारिश है ...... अगर आपको कोई ब्लॉग पसंद आया हो तो कृपया उसे फॉलो करके उत्साह बढ़ाये|

कविता रावत ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

सुंदर रचना.

डॉ. नूतन - नीति ने कहा…

बहुत सुन्दर..नारी पर बनी ये सुन्दर रचना ब्लॉग में शेयर करने के लिए धन्यवाद..

Udan Tashtari ने कहा…

अच्छी लगी कविता..

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

..बढ़िया कविताएँ..सुंदर ब्लॉग।

अरुणेश मिश्र ने कहा…

उत्कृष्ट रचना का संकलन ।

Parul ने कहा…

mukti ji ...ek acchi kavita hum tak pahunchane ke liye shukriya!

Priyanka Soni ने कहा…

बहुत ही झन्नाटेदार...एक सार्थक कविता !

Sonal ने कहा…

bahut hi sundar, shukriya share karne k liye.....

Mere blog par bhi sawaagat hai aapka.....

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abhi ने कहा…

बिलकुल सही बात...