बृहस्पतिवार, 4 फरवरी 2010

अम्मा के सपने

मेरी अम्मा
बुनती थी सपने
काश और बल्ले से,
कुरुई, सिकहुली
और पिटारी के रूप में,
रंग-बिरंगे सपने...
अपनी बेटियों की शादी के,

कभी चादरों और मेजपोशों पर
काढ़ती थी, गुड़हल के फूल,
और क्रोशिया से
बनाती थी झालरें
हमारे दहेज के लिये,
खुद काट देती थी
लंबी सर्दियाँ
एक शाल के सहारे,

आज...उसके जाने के
अठारह साल बाद,
कुछ नहीं बचा
सिवाय उस शाल के,
मेरे पास उसकी आखिरी निशानी,
उस जर्जर शाल में
महसूस करती हूँ
उसके प्यार की गर्मी...

16 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari ने कहा…

माँ को बहुत शिद्दत से याद किया है..माँ एक अहसास है.

Arvind Mishra ने कहा…

ओह ..सारी .......और कुछ नहीं कह पा रहा .....

Arvind Mishra ने कहा…

...... संवेदनाएं साथ हैं !

अनूप शुक्ल ने कहा…

सुन्दर! एहसास!

Mithilesh dubey ने कहा…

माँ के प्यार को एहसासो में बखूबी पिरोया है , लाजवाब रचना लगी ।

महफूज़ अली ने कहा…

ओह! आपने रुला दिया.... बहुत गहरे एहसास हैं.... मैं भी अपनी माँ को बहुत मिस करता हूँ.... बहुत छोटा था.... जब वो चली गयीं .....कहीं भी माँ के ऊपर कुछ भी लिखा देखता हूँ..... तो रोना आ जाता है....

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

इसी विषय पर आपकी एक कविता पढ़ कर आ रहा हूँ .. वहां भी
भूरि - भूरि प्रशंसा किया हूँ और ठीक उन्हीं शब्दों के साथ यहाँ भी
हूँ . यहाँ तो माँ से जुड़े इतने बिम्ब आ गए हैं कि लग रहा है कि
माँ के सामने हूँ .. और हाँ , वह 'जर्जर शाल' , काव्य-चदरिया
है , सम्हाले रहिएगा , सहजता से .. आभार !

Bhawna 'SATHI' ने कहा…

dil ko chu gye bhav or dard dono,sunder hai,badhai...

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

’मुक्ति’ जी, आदाब
कुछ नहीं बचा
सिवाय उस साल के,
मेरे पास उसकी आखिरी निशानी,
उस जर्जर शाल में
महसूस करती हूँ
उसके प्यार की गर्मी...
सच कहा, मां वो एहसास है,
जिसका कोई विकल्प ही नहीं है

भूतनाथ ने कहा…

kyaa khoob.........ab main kahun to kyaa kahun.....bahut bhaavnaapoorn....abhivyakti....!!

Parul ने कहा…

dil ko chuti rachna !

हृदय पुष्प ने कहा…

"बेटियाँ" तो होती ही ऐसी हैं लेकिन आप सबसे उपर - सच्ची और अच्छी रचना.

सतीश पंचम ने कहा…

बहुत सुंदर भावनाएं पिरोई गई हैं। बहुत सुंदर।

Prarthana gupta ने कहा…

maa -beti ka rishta hi aisa hai,jo mann se mann ki souch ko samajhta hai.....har maa khushnasib hai jise ishwar ne beti di hai.....

ma ke liye....

hey maa!
tum pavitr shwet mandakini,
par tum sada mere tann mein lahu ban kar....

tun vyom vishal,
par tum sada mere mann ke dhratal par.....

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

कैसे नहीं पढ़ पाया था इसे ! धिक !

आपके माँ-पिताजी के संस्मरणों पर इस कविता का लिंक पा गया, अन्यथा विरम ही गयी थी यह ! वह गद्य और यह पद्य दोनों को निरख रहा हूँ, निहाल हो रहा हूँ..माँ पर लिखी अनगिन कविताएं याद आ रही हैं !

मूक हुआ जा मन !

संजय भास्कर ने कहा…

pehli bar blog par aaya hoon...
behtreen blog

thanks sunder rachnaye padhwane ke liye