गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

अम्मा के सपने

मेरी अम्मा
बुनती थी सपने
काश और बल्ले से,
कुरुई, सिकहुली
और पिटारी के रूप में,
रंग-बिरंगे सपने...
अपनी बेटियों की शादी के,

कभी चादरों और मेजपोशों पर
काढ़ती थी, गुड़हल के फूल,
और क्रोशिया से
बनाती थी झालरें
हमारे दहेज के लिये,
खुद काट देती थी
लंबी सर्दियाँ
एक शाल के सहारे,

आज...उसके जाने के
अठारह साल बाद,
कुछ नहीं बचा
सिवाय उस शाल के,
मेरे पास उसकी आखिरी निशानी,
उस जर्जर शाल में
महसूस करती हूँ
उसके प्यार की गर्मी...

16 टिप्‍पणियां:

  1. माँ को बहुत शिद्दत से याद किया है..माँ एक अहसास है.

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  2. ओह ..सारी .......और कुछ नहीं कह पा रहा .....

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  3. माँ के प्यार को एहसासो में बखूबी पिरोया है , लाजवाब रचना लगी ।

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  4. ओह! आपने रुला दिया.... बहुत गहरे एहसास हैं.... मैं भी अपनी माँ को बहुत मिस करता हूँ.... बहुत छोटा था.... जब वो चली गयीं .....कहीं भी माँ के ऊपर कुछ भी लिखा देखता हूँ..... तो रोना आ जाता है....

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  5. इसी विषय पर आपकी एक कविता पढ़ कर आ रहा हूँ .. वहां भी
    भूरि - भूरि प्रशंसा किया हूँ और ठीक उन्हीं शब्दों के साथ यहाँ भी
    हूँ . यहाँ तो माँ से जुड़े इतने बिम्ब आ गए हैं कि लग रहा है कि
    माँ के सामने हूँ .. और हाँ , वह 'जर्जर शाल' , काव्य-चदरिया
    है , सम्हाले रहिएगा , सहजता से .. आभार !

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  6. ’मुक्ति’ जी, आदाब
    कुछ नहीं बचा
    सिवाय उस साल के,
    मेरे पास उसकी आखिरी निशानी,
    उस जर्जर शाल में
    महसूस करती हूँ
    उसके प्यार की गर्मी...
    सच कहा, मां वो एहसास है,
    जिसका कोई विकल्प ही नहीं है

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  7. kyaa khoob.........ab main kahun to kyaa kahun.....bahut bhaavnaapoorn....abhivyakti....!!

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  8. "बेटियाँ" तो होती ही ऐसी हैं लेकिन आप सबसे उपर - सच्ची और अच्छी रचना.

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  9. बहुत सुंदर भावनाएं पिरोई गई हैं। बहुत सुंदर।

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  10. maa -beti ka rishta hi aisa hai,jo mann se mann ki souch ko samajhta hai.....har maa khushnasib hai jise ishwar ne beti di hai.....

    ma ke liye....

    hey maa!
    tum pavitr shwet mandakini,
    par tum sada mere tann mein lahu ban kar....

    tun vyom vishal,
    par tum sada mere mann ke dhratal par.....

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  11. कैसे नहीं पढ़ पाया था इसे ! धिक !

    आपके माँ-पिताजी के संस्मरणों पर इस कविता का लिंक पा गया, अन्यथा विरम ही गयी थी यह ! वह गद्य और यह पद्य दोनों को निरख रहा हूँ, निहाल हो रहा हूँ..माँ पर लिखी अनगिन कविताएं याद आ रही हैं !

    मूक हुआ जा मन !

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  12. pehli bar blog par aaya hoon...
    behtreen blog

    thanks sunder rachnaye padhwane ke liye

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