बुधवार, 7 अक्तूबर 2009

एक प्रौढ़ लड़की

रिसता है कुछ दिल से
आँखों के रास्ते
मन के ज़ख्मों के
टाँके टूट गये हैं
शायद,
बड़ी मुश्किल से
सुखाती हूँ इन्हें
फिर कोई
पूछ ही लेता है
घर के बारे में
माँ-पिता के बारे में
अजूबा सा लगता होगा
एक प्रौढ़ लड़की
बिना अभिभावक के
अकेले
कैसे काटती है
ज़िंदगी,
जी लेगी वो
अगर दुनिया
ना कुरेदे
उसके ज़ख्मों को

10 टिप्पणियाँ:

M VERMA ने कहा…

जी लेगी वो
अगर दुनिया
ना कुरेदे
उसके ज़ख्मों को
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति, अकेली लडकी की मार्मिक व्यथा

अजय कुमार झा ने कहा…

बहुत खूब ..जाने कितनी कितनी प्रौढ लडकियों का दर्द सामने रख दिया आपने..

हरीश करमचंदानी ने कहा…

अच्छी और सची कविता

Mithilesh dubey ने कहा…

बहुत ही उम्दा रचना। अकेले रहना हमेशा दर्द नाक और दुःखदायक होता है।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

मन के भावों को आपने कुछ इस तरह से गूंथा है कि पाठक का हृदय झंकृत हो उठता है।
करवाचौथ की हार्दिक शुभकामनाएं।
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बोटी-बोटी जिस्म नुचवाना कैसा लगता होगा?

शरद कोकास ने कहा…

एक लम्बी कविता मेरी भी है अधेड़ होती लड़किया ..इस दर्द को मैने बहुत करीब से देखा है।

ओम आर्य ने कहा…

दर्द से भरी पडी होती है ,अकेलेपन मे डुबी समय काटना बहुत ही कठिन होता है ......... एक बेहतरीन रचना जो वास्तविकता को बडी ही करीब से उकेरा है आपने .....मैने भी देखा है कुछ ऐसे लड्कियो को ....

MUFLIS ने कहा…

naari hone ke ehsaas ko
b.khoobi ujaagar karti hui rachnaa
vaastviktaa ki chubhan ko
shabdoN meiN dhaalna
aur nazm kehnaa.....
stareey lekhan par badhaaee svikaareiN

Arvind Mishra ने कहा…

संकल्प !

neelima garg ने कहा…

good poems...feelings...