रविवार, 8 अगस्त 2010

अनकही सी एक बात

अनकही सी एक बात,
सालती रही दिल को
कितने ही दिन
कितनी ही रातें, 
हिम्मत जुटाकर फिर
कह ही दिया
"लौट आओ"
और वो लौट आया चुपचाप 
बिना कुछ कहे,
मानो उसको भी था इंतज़ार 
इसी छोटी सी एक बात का, 
जो रह जाती है अक्सर
अनकही   
और तोड़ जाती है 
कितने ही रिश्तों को 
अहंकार के चलते ... ... ...

28 टिप्‍पणियां:

  1. सटीक बात ..बहुत बार अनकहा ही रिश्तों को तोड़ जाता है....बिना कहे भावनाओं का कहाँ पता चल पाता है .....सुन्दर ..

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  2. मै तुमसे न बोलूं
    तुम मुझसे न कहना
    कहती रहें आँखे
    बहते रहे नैना :)

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  3. रिश्तों में अहम् की दीवार न हो तो रिश्ते टूटें ही नहीं..
    _बहुत बार ' एक पुकार 'के इंतज़ार में दोनों मौन रहते हैं ..ये पुकार भी समय रहते की जाए तो सार्थक अन्यथा प्रायश्चित के सिवा कुछ नहीं बचता...
    एक गीत याद आया है ..'तुम पुकार लो...तुम्हारा इंतज़ार है...:)

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  5. आप ने उसको थोड़ा सा, चुटकी भर अधिक अहंकारी बता दिया :)
    इस चुटकी भर के स्वीकार से ही तो बन्धन बना रहता है - कभी वह स्वीकारता है तो कभी वह स्वीकारती है।
    एक ठो गीत याद आ गया। सभी लोग बता रहे हैं तो हम भी गुस्ताख हो लेते हैं:
    "हम इंतज़ार करेंगे तेरा क़यामत तक
    खुदा करे कि क़यामत हो और तू आए।"

    पहली वाली टिप्पणी में टाइपिंग की गलती थी सो मिटा दिया।

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  6. भावनाओ की बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है, और साथ ही एक बहुत बड़ा सच, कमाल की रचना है, बेहतरीन, जितनी तारीफ की जाए कम है!

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  7. सच कहा आपने...
    एक शायर ने कहा है-
    इक तबस्सुम हज़ार शिकवों का
    कितना प्यारा जवाब होता है...

    एक शेर और देखें-
    ऐसा मिलना भी किस काम का, दिल में जो फ़ासला छोड़ दे
    मैं भी अपनी ये ज़िद छोड़ दूं, तू भी अपनी अना छोड़ दे.

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  8. Dekh liya,tippani kal subah salkante...3g mob.ab chaltaau tippani thode hi karni hai;-)

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  9. कितना कुछ अनकहा है...
    क्या हिसाब लगायें .........
    वैसे भी अपनी गडित कमजोर हो.......
    तभी तो टीचरों के
    डंडे खाते रहे.......
    आज भी खाते हैं .........
    कभी बाजार के तो..
    कभी समाज के ना जाने इतने बाजार क्यों हैं ?
    यहाँ ..जबकि जेब में एक पैसा नहीं.........
    लाजवाब अभीव्यक्ति अनकही बातों की .........aapki..

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  10. नन्ही सी क्यूट सी कविता ...म अगर देखिये तो हरिवंश राय बच्चन ने पहले ही नहले पर दहला रखा हुआ है -
    एक कवयित्री को एक कवि का जवाब
    ........
    इसीलिये खडा रहा कि भूल तुम सुधार लो !
    इसीलिये खडा रहा कि तुम मुझे पुकार लो
    पुकार कर दुलार लो ,दुलार कर सुधार लो ..

    कोई अभी भी कवयित्री की ओर निर्मिमेष आँखों से निहार रहा है ....

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  11. सच में.....हम रिश्ते बनाने में बरसों लगा देते हैं..लेकिन महज एक गलफहमी या ईगो के नाम पर चंद सैकेंड में ही रिश्ते तोड देते हैं....फिर ईगो के नाम पर ही एक बार भी खुद पहल नहीं करते.....

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  12. जरा से अहम् में जिंदगी के कितने पल बीत जाते हैं अनकहे ...
    मेरी कविता की एक लाईन पेस्ट कर दूं ...
    " प्रेम आखिर पलता कहाँ है ....
    स्वतंत्र तो कर दिया है तुम्हे मगर लौट ही आओगे
    यह विश्वास रखने में ही तो "
    अच्छी लगी कविता तुम्हरी ...!

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  13. अनकही
    और तोड़ जाती है
    कितने ही रिश्तों को
    अहंकार के चलते .


    -बहुत गंभीर बात कह गई इन शब्दों मे...बहुत खूब!

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  14. ओब्ज़र्वेशन कमाल है ... रचना जैसा ही ...
    ज़रा सी बात में बड़ी सी बात कह दी ...

    शहीद मिर्ज़ा साहब का शेर भी इसी क्रम में सटीक और खूबसूरत लगा
    ऐसा मिलना भी किस काम का, दिल में जो फ़ासला छोड़ दे
    मैं भी अपनी ये ज़िद छोड़ दूं, तू भी अपनी अना छोड़ दे.

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  15. मानो उसको भी था इंतज़ार
    इसी छोटी सी एक बात का,
    जो रह जाती है अक्सर
    अनकही
    और तोड़ जाती है
    कितने ही रिश्तों को

    बस यही अनकहा तो है,जिसे शब्द नहीं दिए जाते और....दूसरा अपने आप उस अनकहे में शब्द पिरो लेता है...और फिर शुरू हो जाता है...एक अंतहीन इंतज़ार का सिलसिला...
    बड़ी खूबसूरती से काम शब्दों में बड़ी बात कह दी..

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  16. मंगलवार 10 अगस्त को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है .कृपया वहाँ आ कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ....आपकी अभिव्यक्ति ही हमारी प्रेरणा है ... आभार

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  17. खूबसूरत कविता। समझदारी की बात!

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  18. मानो उसको भी था इंतज़ार
    इसी छोटी सी एक बात का,
    जो रह जाती है अक्सर
    अनकही
    और तोड़ जाती है
    कितने ही रिश्तों को

    खामोशी भी एक ज़बान हैं बनिस्बत कि समझने वाला हो !

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  19. इसी छोटी सी एक बात का,
    जो रह जाती है अक्सर
    अनकही
    और तोड़ जाती है
    कितने ही रिश्तों को
    अहंकार के चलते ... ...
    ..sateek ukti...
    ...yahi ahankaar to hai jiske chalti majboot rishton mein darar padte der nahi lagti...
    ...Saarthak rachna...

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  20. अनकही
    कही
    लौट आया
    चुपचाप
    यही बात है
    सही
    कह देना चाहिए
    अनकही.

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  21. हर बार शब्द जरुरी नहीं होते, सच तो नहीं.
    बेआवाज सुनता तो खुदा न हो जाता.

    हल्की सी कविता जो धीरे से आई और गंभीर कर गयी...बधाई हो.

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  22. फ़िर पढ़ा! फ़िर अच्छा लगा। इससे संबद्ध तो नहीं लेकिन ऐसे ही वसीम बरेलवी का यह शेर याद आता है:

    मोहब्बत में बुरी नीयत से कुछ भी सोचा नहीं जाता
    कहा जाता है उसे बेवफ़ा, बेवफ़ा समझा नहीं जाता।


    कोई रिश्ता बचाने के किसी के जरा से अहम को संतुष्ट करना समझदारी है -हार नहीं।

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  23. mukti ..

    kya kahu.. kavita ne intjaar jaise shabd ko itna sundar bana diya hai ki ,main ab kuch aur nahi kah sakta hoon.. aapne bahut hi gahri baat kahi hai ,rishte isliye jyadatar tutte hai ..ahnkaar ki wajah se ...mujhe ye poem yaad rahengi .. apse request hai ki mujhe ye poem email me bhej , mere personal collection ke liye ..

    dhnaywad.

    BADHAI

    VIJAY
    आपसे निवेदन है की आप मेरी नयी कविता " मोरे सजनवा" जरुर पढ़े और अपनी अमूल्य राय देवे...
    http://poemsofvijay.blogspot.com/2010/08/blog-post_21.html

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  24. bahut sundar rachna .... thanx
    मै तुमसे न बोलूं
    तुम मुझसे न कहना
    कहती रहें आँखे

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