गुरुवार, 20 मई 2010

मेरा होना या न होना

मैं तभी भली थी
जब नहीं था मालूम मुझे
कि मेरे होने से
कुछ फर्क पड़ता है दुनिया को,
कि मेरा होना, नहीं है
सिर्फ औरों के लिए
अपने लिए भी है.

जी रही थी मैं
अपने कड़वे अतीत,
कुछ सुन्दर यादों,
कुछ लिजलिजे अनुभवों के साथ,
चल रही थी
सदियों से मेरे लिए बनायी गयी राह पर,
बस चल रही थी ...

राह में मिले कुछ अपने जैसे लोग
पढ़ने को मिलीं कुछ किताबें
कुछ बहसें , कुछ तर्क-वितर्क
और अचानक ...
अपने 'होने' का एहसास हुआ,

अब ...
मैं परेशान हूँ
हर उस बात से जो
मेरे 'होने' की राह में रुकावट है...

हर वो औरत परेशान है
जो जान चुकी है कि वो 'है'
पर, 'नहीं हो पा रही है खुद सी'
हर वो किताब ...
हर वो विचार ...
हर वो तर्क ...
दोषी है उन औरतों की,
जिन्होंने जान लिया है अपने होने को
कि उन्हें होना कुछ और था
और... कुछ और बना दिया गया .

45 टिप्‍पणियां:

  1. अन्तर्मन की उलझन को कितने सुलझे हुए शब्दों में प्रस्तुत कर दिया....

    जी बहुत बढ़िया

    ,कुंवर जी,

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  2. इसलिए पुराने लोग कहते थे कि लड़कियों को ज्यादा पढ़ाना , लिखाना नहीं चाहिए.:) .
    अंतर्मन कि दुविधा और अपने अस्तित्व कि लड़ाई को बखूबी शब्द दिए हैं तुमने.

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  3. आराधना ,यह महज औरतों की नियति नहीं है -हम्मे में से अधिकाँश यही विभीषिका झेल रहे हैं और इसी आपाधापी जीवन चुकता जा रहा है -आपकी कवितायेँ सहज सरल और आसानी से बुद्धिगम्य होती हैं और अपनी प्रभावोत्पाकता के कारण यादगार बन जाती हैं !

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  4. सुंदर कविता है।

    टेम्पलेट तो बहुतै मस्त लगा।

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  5. कहते हैं अपने लिए जीना कोई जीवन नहीं ,असल जीवन तो वह है जो दूसरों को सत्य आधारित न्याय दिलाने के लिए जिया जाय / अच्छी सार्थक कविता / आराधना जी आज हमें सहयोग की अपेक्षा है और हम चाहते हैं की इंसानियत की मुहीम में आप भी अपना योगदान दें / पढ़ें इस पोस्ट को और हर संभव अपनी तरफ से प्रयास करें ------ http://honestyprojectrealdemocracy.blogspot.com/2010/05/blog-post_20.html

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  6. हर वो किताब ...
    हर वो विचार ...
    हर वो तर्क ...
    दोषी है उन औरतों का
    जिन्होंने जान लिया है अपने होने को
    कि उन्हें होना कुछ और था
    और... कुछ और बना दिया गया .

    -हम्म!! वाकई शानदार अभिव्यक्त किया है.

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  7. बढिया रचना है।बधाई।

    हर वो किताब ...
    हर वो विचार ...
    हर वो तर्क ...
    दोषी है उन औरतों का
    जिन्होंने जान लिया है अपने होने को
    कि उन्हें होना कुछ और था
    और... कुछ और बना दिया गया .

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  8. कभी कभी लगता है जब खुद नहीं जानते थे तब कितने खुश थे हम आज खुद को जानने के बाद हर पर उलझन में रहते है ....हर नारी के मन की भावना को अपने शब्द देने के लिए धन्यवाद

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  9. दोषी है उन औरतों का
    जिन्होंने जान लिया है अपने होने को
    कि उन्हें होना कुछ और था
    और... कुछ और बना दिया गया .


    सटीक लेखन...पहली बार शायद मैंने आपको पढ़ा है....और मन का द्वन्द कहूँ या परिपक्कव विचार...कहीं मन को छू गए...

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  10. दुविधा को बहुत खूबसूरती से दर्शाया है आपने....

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  11. तभी तो हर इन्सान भला था न जब उसे पता ही नही था कि इन्सान बने रहना इतना मुश्किल है.. जबसे लोगो ने इन्सानियत ओढी है, वो भी ऐसे ही परेशान है... कभी कभी लगता है कि इतना जानना ही नही चाहिये था.. ज़िन्दगी जैसे खुद परेशान सी लगती है..

    बहुत ही सुन्दर कविता.. एक कश्मकश को बया करती हुयी... अच्छा तो तुम लिखती ही हो.. वेरी वेरी ब्यूटीफ़ुल...

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  12. हर वो औरत परेशान है
    जो जान चुकी है कि वो है
    पर, नहीं हो पा रही है अपनी सी

    कितने प्रभावी ढंग से नारी मन के अंतर्द्वंद्व को उभरा है...बस अपने होने का अहसास ना हो तो फिर मन कोई भी कामना ना करे

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  13. बढ‌़िया लगा पढ़ना बहुत बढ़िया लेकिन समझ नहीं आया ।

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  14. हर वो तर्क ...
    दोषी है उन औरतों का
    जिन्होंने जान लिया है अपने होने को
    कि उन्हें होना कुछ और था
    और... कुछ और बना दिया गया ....

    नारी के अंतर्मन की व्यथा की शानदार अभिव्यक्ति ...!!

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  15. असली मीनाकुमारी की रचनाएं अवश्य बांचे
    फिल्म अभिनेत्री मीनाकुमारी बहुत अच्छा लिखती थी. कभी आपको वक्त लगे तो असली मीनाकुमारी की शायरी अवश्य बांचे. इधर इन दिनों जो कचरा परोसा जा रहा है उससे थोड़ी राहत मिलगी. मीनाकुमारी की शायरी नामक किताब को गुलजार ने संपादित किया है और इसके कई संस्करण निकल चुके हैं.

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  16. सच में यह नियति केवल औरत की नियति नहीं !

    सहजता से अभिव्यक्त कर डाला है आपने मन का बहुत कुछ !
    आभार ।

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  17. सुन्दर अभिव्यक्ति । आज स्त्री सचमुच दोराहे पर पा रही है अपने को और अपनों को भी ।

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  18. "मैं परेशान हूँ
    हर उस बात से जो
    मेरे होने की राह में रुकावट है...
    हर वो औरत परेशान है
    जो जान चुकी है कि वो है"
    अपने तरह की अलग सोच सच्ची और बहुत अच्छी लगी

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  19. SACH HI KHA,JAN LENE KE BAD CHAIN NHI RHTA HAI,BINA JANE JO KRIYE KRTE RHIYE..JITE RHIYE..KHUSH RHIYE..EK BAR JAN GYE KHUD KO PHIR DUSRO KI MRJI SE JINA NHI HO PATA HAI,YHI KABHI KBHI DUKH V BN JATA HAI,KYU HM JAN GYE KHUD KO....
    ACHI LGI KAVITA..

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  20. प्रभावी अभिव्यक्ति.
    सच..खुद को न ही पहचाने /जाने तो बहुत बेहतर रहता है.

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  21. मैं परेशान हूँ
    हर उस बात से जो
    मेरे होने की राह में रुकावट है...
    हर वो औरत परेशान है
    जो जान चुकी है कि वो है
    पर, नहीं हो पा रही है अपनी सी......

    साधारण शब्दों में अति प्रभावशील अभिव्यक्ति...........औरत की उलझनों को बहुत अच्छी तरह प्रस्तुत किया है

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  22. मैं परेशान हूँ
    हर उस बात से जो
    मेरे होने की राह में रुकावट है...
    ... kitna sach hai yeh!

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  23. मैं तभी भली थी
    जब नहीं था मालूम मुझे
    कि मेरे होने से
    कुछ फर्क पड़ता है दुनिया को
    कि मेरा होना, नहीं है
    सिर्फ औरों के लिए
    अपने लिए भी है.,,,,,,,
    इन्सान तभी तक अच्छा क्यों होता है जब तक वों पूरी सिदाद्दत के साथ केवल अपने लिए जीता है.....

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  24. Jevan ki kashmakash .. jeene ki jaddo-jahad ... samay ki dhaara mein khud ko kho dene ka dard ... ansulje tark-vitark ... bahut gahraai se aapne antar ke antardwand ko utaara hai is rachna mein ... bahut hi prabhaavi rachna ...

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  25. ek dum zabardast.....ek baar yah ehsas ho jana ki main kuch hun ...aur apne astitva par barabar aanch aanaa..tiulmila hi deta hai ...behad achhi lagi yah rachna..

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  26. कहा था इतना मत जानो अपने को. फंस गई न....जब जान लिया है अपने को. तो लोगो को भी जानो..समाज को भी जानो....औऱ होते रहो परेशान...हद है इतना समझदार होने के लिए किसने कहा था....जितना समझाया था उससे ज्यादा की जरुरत ही कहां थी, पर नहीं माने..समझ लिया जान लिया अपने को.....खैर चिंता न करो. अभी कई बेड़ियां हैं कितने तोड़ोगी.....ये भी कोई बात हुई....अऱे चुपचाप बैठो . गहने पहनो, खाओ पिओ....संतान जन्मो बस और क्या....अभी आरक्षण के दिनों में एक आलिम फाजिल ने कहा था न, भूल गई क्या......

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  27. का बात है !! :-)
    एकदम्मे 'फेमिना मिस वल्ड' हो गयी हो.
    हा हा हा
    हर वो औरत परेशान है
    जो जान चुकी है कि वो है
    पर.......
    यहीं पर गाडी फंस जाती है.

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  28. naari ke antarman, uski vyatha, usaki soch, usake housake astitva ko ukerati se rachna..

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  29. कविता आपके नाम को सार्थक करती है।बधाई। जो टिप्‍पणिया सचमुच गंभीरता से आपकी कविता की समालोचना कर रही हैं उन पर जरूर ध्‍यान दीजिएगा।

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  30. कहां गोता लगा गईं आप, एक महीने से लापता हैं मुक्ति जी। मेरे ब्लॉग पर भी नहीं आतीं आप। शिकायत है आपसे। जो देखें सही कहें उनका इंतजार रहता है मुझे अपने ब्लॉग पर। उम्मीद है कि आप पुन प्रगट होंगी औऱ दिखेंगी जल्दी ही।

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  31. हर वो किताब ...
    हर वो विचार ...
    हर वो तर्क ...
    दोषी है उन औरतों का
    जिन्होंने जान लिया है अपने होने को
    कि उन्हें होना कुछ और था
    और... कुछ और बना दिया गया ..
    बहुत सुन्दर कविता है आराधना. लिखती रहो ऐसे ही.

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  32. कुछ-कुछ उचित लिखने का प्रयास किया है आपने...

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  33. आपकी रचनाये मर्मस्पर्शी होती है .. अंतरात्मा की झंझोड़ते हुए सोचने पर विवश कर देती है .... नारी -जीवन के उन पहलूओ को छुती हुई , जिन्हें , पुरुष वर्ग या तो गौण समझता है, या फिर नजरंदाज कर के चलता है. मुक्ति जी "Feminist poems" इक सार्थक पहल है. .. इस सोये हुए समाज को जगाने की .. जो इक औरत के पड़ने पर इस लिए पाबन्दी लगा कर खुश होता है . की कही वोः मुझसे सवाल तो नहीं कर बैठे .. अपने होने का .. अपने अधिकारों का और अपने अस्तित्त्व का ..
    नहीं जानता क्या परिवर्तित होगा .. क्या नहीं ? लेकिन ख़ामोशी से बड़ा गुनाह कुछ और नहीं है !!!
    http://emotional-fools.blogspot.com/

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  34. अब ...
    मैं परेशान हूँ
    हर उस बात से जो
    मेरे होने की राह में रुकावट है...
    हर वो औरत परेशान है
    जो जान चुकी है कि वो है
    पर, नहीं हो पा रही है अपनी सी
    हर वो किताब ...
    हर वो विचार ...
    हर वो तर्क ...
    दोषी है उन औरतों का
    जिन्होंने जान लिया है अपने होने को
    कि उन्हें होना कुछ और था
    और... कुछ और बना दिया गया ..
    ye paksh to anjaana raha ,bahut khoobsurat rachna .

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  35. नारी की सहज और सामाजिक स्थिति का चित्रण ।
    सराहनीय ।

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