बृहस्पतिवार, 13 अक्तूबर 2011

मेरे दोस्त

मैं खुद को आज़ाद तब समझूँगी
जब सबके सामने यूँ ही
लगा सकूँगी तुम्हें गले से
इस बात से बेपरवाह कि तुम एक लड़के हो,
फ़िक्र नहीं होगी
कि क्या कहेगी दुनिया?
या कि बिगड़ जायेगी मेरी 'भली लड़की' की छवि,
चूम सकूँगी तुम्हारा माथा
बिना इस बात से डरे
कि जोड़ दिया जाएगा तुम्हारा नाम मेरे नाम के साथ
और उन्हें लेते समय
लोगों के चेहरों पर तैर उठेगी कुटिल मुस्कान

जब मेरे-तुम्हारे रिश्ते पर
नहीं पड़ेगा फर्क
तुम्हारी या मेरी शादी के बाद,
तुम वैसे ही मिलोगे मुझसे
जैसे मिलते हो अभी,
हम रात भर गप्पें लड़ाएँगे
या करेंगे बहस
इतिहास-समाज-राजनीति और संबंधों पर,
और इसे
तुम्हारे या मेरे जीवनसाथी के प्रति
हमारी बेवफाई नहीं माना जाएगा

वादा करो मेरे दोस्त!
साथ दोगे मेरा,
भले ही ऐसा समय आते-आते
हम बूढ़े हो जाएँ,
या खत्म हो जाएँ कुछ उम्मीदें लिए
उस दुनिया में
जहाँ रिवाज़ है चीज़ों को साँचों में ढाल देने का,
दोस्ती और प्यार को
परिभाषाओं से आज़ादी मिले.

44 टिप्पणियाँ:

वन्दना ने कहा…

्वाह ……………मुक्ति जी बहुत सुन्दर भावो को संजोया है लेकिन ऐसे समाज की अभी तो कल्पना भी नही कर सकते मगर ऐसा भी हो सकता है इसे भी नकारा नही जा सकता।

राजेश उत्‍साही ने कहा…

वो सुबह कभी तो आएगी...उस सुबह का इंतजार कर।

रश्मि प्रभा... ने कहा…

दोस्ती और प्यार को
परिभाषाओं से आज़ादी मिले... kaash

Sonal Rastogi ने कहा…

आराधना कुछ दोस्त हमसे बेवजह के दकियानूसी कारणों से दूर हो जाते है जबकि हम जानते है वो दोस्त हमारी बहुत सी सहेलियों से कहीं बेहतर है ,दुनिया की फिक्र ,साथ चलने पर वक्र होती निगाहें एक अच्छी खासी सहज दोस्ती में असहजता ला देती है ...ऊपर से बेकार की नसीहते और दोस्ती में अवांछित कुछ ढूँढने की कोशिशे . एक दिन हमपर थोप देती है मर्यादा ....
बेहद पसंद आई तुम्हारी ये कविता

Mired Mirage ने कहा…

मुक्ति यह स्थिति, यह मुक्ति केवल हम ही ला सकते हैं.वैसे मुम्बई जैसी जगह में दुनिया को अन्तर नहीं पड़ेगा, पड़ेगा तो मित्र व सखी के पत्नी व पति को ही. और इस अधिकारबोध से मुक्ति पाना बहुत कठिन है.जिस दिन प्रेम अधिकारबोध से मुक्त हो जाएगा, जीवन सहज हो जाएगा.
घुघूतीबासूती

रचना ने कहा…

very nice poem

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

बहुत ख़ूबसूरत !!
यक़ीनन ,,,दोस्ती और प्यार को
परिभाषाओं से आज़ादी मिले.

ताकि खुली हवा में साँस ली जा सके क्योंकि हर नारी अपनी मर्यादाओं से अवगत होती है

रचना दीक्षित ने कहा…

वादा करो मेरे दोस्त!
साथ दोगे मेरा,
भले ही ऐसा समय आते-आते
हम बूढ़े हो जाएँ,
या खत्म हो जाएँ कुछ उम्मीदें लिए
उस दुनिया में
जहाँ रिवाज़ है चीज़ों को साँचों में ढाल देने का,
दोस्ती और प्यार को
परिभाषाओं से आज़ादी मिले.

दोस्ती और प्यार को अलग कर सोचने की कोशिश. यह एक बेहतरीन भावनात्मक कविता है.

बहुत बधाई.

Arvind Mishra ने कहा…

यह किसके लिए है :) ?
वाणी शर्मा की पोस्ट पर इस कविता पर यह कमेन्ट कर आ रहा हूँ वहां पूरी नहीं पढ़ा था ...
मैं व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता को ज्यादा सम्मान देता हूँ इसलिए आराधना की कविता मुझे ज्यादा स्वीकार्य और सहज लगी ...हाँ ऐसी स्वतंत्रता देश काल से थोडा तारतम्य बिठा सके तो ठीक हैं नहीं तो यह भी ठीक है -
लीक छोड़ तीनों चलें शायर सिंह सपूत

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

बहुत सुंदर रचना है। मुझे पूरा विश्वास है कि ऐसा समाज भविष्य में बनना तय है।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

हम रात भर गप्पें लड़ाएँगे
या करेंगे बहस
इतिहास-समाज-राजनीति और संबंधों पर,
और इसे
तुम्हारे या मेरे जीवनसाथी के प्रति
हमारी बेवफाई नहीं माना जाएगा

बहुत खूबसूरत ख़याल ... यदि जीवन साथी का ही सहयोग मिल जाए तो ..वो एक दूसरे को अच्छे से समझें ... तो ऐसी स्थिति आने में वक्त नहीं लगेगा ... दुनिया तो बाद में आती है ... बहुत पसंद आई यह रचना

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

बहुत ही अच्छी लगी आपकी यह कविता।
-----
कल 15/10/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

Samar ने कहा…

कॉफी हॉउस की उस शाम की याद दिला दी तुमने तो आराधना जब हमारी टेबल के ठीक सामने बैठे उस जोड़े की 'हरकतों' से बहुत असहज हो आयी थीं तुम.. मेरे उनका समर्थन करने पर असहज हो आया तुम्हारा चेहरा आज भी याद है मुझे.. और उसके बाद की आनंद भवन के सामने उस नए खुले रेस्टोरेंट 'चाहत' की वह शाम जब एक और जोड़ा पहले वाले जोड़ों से काफी सहज भाव में था और उससे भी ज्यादा सहज तुम.
अच्छा लगा कि एक दशक से भी ज्यादा पहले की उस शाम से तुम बहुत आगे निकल आयी हो. बाकी बस यह कि कुछ दोस्त हमेशा दोस्त रहते हैं और उनमे से एक तो मैं शुमार हूँ ही..

सागर ने कहा…

कभी कभी कितना अकेली पड़ जाती हो... होता है ना भीड़ में भी भी लगता है कोई साथ नहीं होगा. तब ऐसे ही भाव उठते हैं.. शुक्र है दुनिया पर तुम्हारा अभी भी यकीन है.. देखो समर ने कितनी अच्छी बात कही है...

ये एक औरत के दिल से निकले कुछ शब्द ही हैं.

M VERMA ने कहा…

परिभाषाओं से परे जीने की तड़प और कश्मकश की सुन्दर रचना ...
बेहतरीन

rashmi ravija ने कहा…

कविता पढ़ी..और कमेंट्स भी..
कई लोगो ने लिखा है...वह सुबह कभी तो आएगी..वो दिन कभी तो आएगा. घुघूती जी ने कहा...मुंबई जैसी जगह में दुनिया को अंतर नहीं पड़ता...

थोड़ा आगे बढ़कर कहूँ...सिर्फ हमारे माइंड सेट की बात है...वरना...महानगरो में तो ऐसे दिन आ चुके हैं...जब सहकर्मी साथ काम करते हैं...दौरे पर जाते हैं..अच्छे दोस्त बन जाते हैं...तो ये सब बहुत अनचीन्हा ,अनजाना नहीं रह जाता . कई बार खुद पति या पत्नी मना कर देते हैं कि तुमलोग दोस्त हो...तुमलोग मिल आओ...और पीछे से वे यह सोच सोच माथा नहीं खराब करते कि दोनों क्या कर रहे होंगे..इसलिए कि उनके भी अपने दोस्त होते हैं...और उन्हें भी पता होता है...कि मिलकर क्या करते हैं.
ऐसी आदर्श स्थिति बहुत कम है..पर है....और आने वाले दसेक वर्षों में जब ज्यादा से ज्यादा स्त्रियाँ ,घर से बाहर निकल कर काम करने लगेंगीं तो खुद-ब-खुद इस तरह की आदर्श स्थिति आम हो जायेगी.
भले ही ऐसा समय आते-आते
हम बूढ़े हो जाएँ,
या खत्म हो जाएँ कुछ उम्मीदें लिए
उस दुनिया में
जहाँ रिवाज़ है चीज़ों को साँचों में ढाल देने का,
दोस्ती और प्यार को
परिभाषाओं से आज़ादी मिले.

बूढे नहीं होना पड़ेगा मुक्ति....ऐसी स्थिति दूर नहीं....:)

सारी स्त्रियों के मन के भाव बड़े सुन्दर तरीके से कविता में ढाल दिया है..

ana ने कहा…

wah!...bahut achchhi post

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…

मुझे बदलना रूढी बातें, रिश्ते नाते खालीपन
वही ज़माना मुझको लाना, जो चाहे कर डाले मन

मीनाक्षी ने कहा…

तुम्हारी कल्पना किसी का सच हो सकता है...
जिन्हें रिश्तों पर प्रेम और विश्वास होता है...
उनके लिए सच कड़वा नहीं सहज होता है..
रश्मि रविजा की टिप्पणी ने कविता और टिप्पणियों को समेट कर खूबसूरत रूप दे दिया......

neer ने कहा…

BAHOOT KHOOB... SHABDO ME JAISE VAW HN WO ANMOL HN...

abhi ने कहा…

:) :) बहुत ख़ूबसूरत !

Parul ने कहा…

chalo tumne to isko paribhashaon se pare gadha hai..badhai ki patr ho tum...vakai!!

Girl Next Door ने कहा…

simply awsm........ just loved it.....n really wish that ppl should grow upto that level

sushma 'आहुति' ने कहा…

बहुत ही खुबसूरत....और सार्थक अभिवयक्ति.....

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

itne badlaav aa chuke hain to vo din bhi door nahi ki

तुम्हारे या मेरे जीवनसाथी के प्रति
हमारी बेवफाई नहीं माना जाएगा

sunder, bebak prastuti.

J'D ने कहा…

Lovely creation... Check out this Philosophical Hindi Poem Too... And do follow the blog...

http://loveisaspiritualforce.blogspot.com/2011/10/dhoop-sab-pee-ke-sanvar-jaao.html

sumeet "satya" ने कहा…

एक प्यार का नगमा है
मौजों की रवानी है.....
जिंदगी और कुछ भी नहीं
तेरी-मेरी कहानी है....

अभिषेक मिश्र ने कहा…

Agree with the 'Girl next Door'.
शायद यह स्वप्न कभी हकीकत भी बन पाए !

Kailash C Sharma ने कहा…

बहुत सार्थक सोच...कभी तो अवश्य सच होगी..दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें!

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

शुभकामनाएँ।

Rahul Paliwal ने कहा…

सिर्फ एक जिन्दंगी हैं. उसे अपने ही तरीके से जिया जाये. कुछ रिश्तो को परिभाषित न ही किया जाये तो अच्छा हैं.

अग्निमन ने कहा…

bahuti hi sundar

अग्निमन ने कहा…

bahut hi sundar bhav

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

एक बढ़िया कविता जो लम्बे विमर्श के लिए प्रेरित करती है...छूट रही थी।

मुझे नहीं लगता कि वह दिन आ पायेगा जिसकी कल्पना की गई है कविता में। वह दिन कहां होगा जहां सिर्फ प्रेम ही प्रेम होगा सभी के दिलों में! प्रेम नहीं मांगेगा प्रत्युत्तर, नहीं होगी अधिकार की भावना! अपनो को दूसरे से गलबहियां करते हुए भी सहज भाव से देखने का उदार मन!! मुझे तो नहीं लगता। क्या मिट जायेगा द्वेष, क्रोध, लोभ इस जहां से? बिना इसके, आजादी कहां संभव है प्रेम की! हाँ, कामना करता हूँ कि हो वैसा ही जैसा लिखा है आपने।

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

जन्म दिन की ढेर सारी शुभकामनाएं।

smshindi By Sonu ने कहा…

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Pratibha Katiyar ने कहा…

Gajab!kitna sundar bhaw.

Pratibha Katiyar ने कहा…

Gajab!kitna sundar bhaw.

boletobindas ने कहा…

आप दो महीने से कहां लापता हैं पता नहीं....उम्मीद करता हूं कि देर से ही सही नव वर्ष की मेरी शुभकामनाएं आप तक जरुर पहुंच जाएंगी......लापता गंज से निकल कर अगर आपका पता वापस गुलजार हो तो अच्छा लगेगा..

वन्दना ने कहा…

आपके ब्लोग की चर्चा गर्भनाल पत्रिका मे भी है और यहाँ भी है देखिये लिंक ………http://redrose-vandana.blogspot.com

दीपिका रानी ने कहा…

रश्मिजी से आपके ब्लॉग का पता मिला और इस तरह पता मिला एक खूबसूरत रचना संसार का। उम्मीद है आपको आगे भी पढ़ते रहेंगे..

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

dosti jindabad:) ka nara buland ho jayega.. jis din aapke kavita ki soch sachchai me badal jayegi:)

अभिषेक प्रसाद 'अवि' ने कहा…

Mukti ji achha likhne ke baawjood aap kaafi samay se shakriya najar nahi aa rahi... iska kya kaaran hai...

anju(anu) choudhary ने कहा…

वाह बहुत खूब

पर क्या ऐसा कोई दिन आएगा ...ऐसा होना संभव हैं क्या ????