शुक्रवार, 27 मार्च 2015

नचनिया

शादी के जश्न में डूबे घराती-बराती
जब सो रहे होते हैं गहरी नींद
कुछ किशोर युवक देखते छिपकर अँधेरे कमरे में
नचनियों को, उतारते अपने मेकअप और कपड़े,

गहरी  काली रात में दिप-दिप करती ढिबरी का प्रकाश
बना देता है चीजों को हज़ार गुना रहस्यमयी
उत्सुक हैं किशोर जानने को वर्जित बातें
लुका-छिपी का खेल ही तो है जीवन सारा कम से कम अभी उनके लिए
रोमांच पैदा करती हैं छिपी हुयी बातें उनके मासूम दिलों
कौतूहल और स्फूर्ति से भरे शरीरों में

लगाते अनुमान देखकर वे नचनियों को
क्या डालकर बनाया होगा उन्होंने औरतों सा मगर बनावटी उभार?
उतारेंगे किस तरह उनको नाच खत्म होने के बाद ?
कैसे होता है नचनियों का शरीर हमसे भिन्न इतना लचीला?
नाचते क्यों हैं आखिर वे ठुमक-ठुमककर इतना अच्छा?
होते  हैं कैसे इतने सुन्दर वे भला?

जैसे-जैसे उतरता जाता है नचनियों का बाह्य आवरण 
जश्न की नाच में उन पर मुग्ध छिपकर उनको देखते किशोरों का
आकर्षण भी उतरता जाता है
कुंठाग्रस्त-मासूम-उत्सक-कामलोलुप उनकी दृष्टि
देखना चाहती थी कुछ और- दृश्य कुछ और ही था

सिर से नोच-नोचकर नकली बालों का विग निकालता
अधेड़ उम्र का दुबला-पतला, थका-हारा, हाँफता नचनिया
उतारता एक-एक कर गहने-कपड़े पाउडर-लाली
गपर-गपरकर मुँह में ठूँसता भोजन एक हाथ से
निकालकर पढ़ता है एक पर्ची,
जिसमें इस सीज़न के सट्टों की तारीखें लिखी हैं।


मंगलवार, 10 मार्च 2015

कुछ पंक्तियाँ

बहिष्कृत-स्वीकृत 

घर समाज से 'बहिष्कृत' स्त्रियाँ
गढ़ती हैं स्त्रियों की बेहतरी की नयी परिभाषाएँ
बनाती हैं नए प्रतिमान,
वे कुछ और नहीं करतीं
बस 'सोचती' हैं
वही, जिसे करने की फुर्सत ही नहीं दी जाती
घर-परिवार-समाज में स्वीकृत महिलाओं को।
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 छिपे भेड़िये
(१)
भेड़िया, भेड़िया रहने पर उतना बुरा नहीं होता
वह हो जाता है ज़्यादा खतरनाक भेड़ की खाल पहनकर,
स्त्री-स्वतंत्रता की बात करते हुए
और  भी अधिक घातक।
(२)
स्त्रियाँ, चाय सूँघकर बता देती हैं चीनी की सही मात्रा
स्त्रियाँ निगाहें सूँघकर पहचान लेती हैं
भेड़ की खाल में छिपे भेड़िये।
(३)
खुद  को लाचार दिखाने वाले पुरुष
अक्सर पाए जाते हैं बेहद शक्तिशाली
खुद  को ताकतवर बताने वाले उतने ही कमज़ोर,
बेहतर है कि वे सच ही बोलें
कि स्त्रियों को खूब आता है
झूठ पकड़ने का हुनर। 


सोमवार, 17 जून 2013

औरतें और उनके रहस्यों की गठरी

ये तब की बात है जब औरतें
नहीं करती थीं बातें अपने बारे में
मन में रखी हुयी रहस्यों की गठरी में
हज़ार गांठें बाँध, रखे रहती थीं कसकर पकड़,

उनकी  खुद की कोई सोच भी तो न थी
कि इसका जिम्मा ले रखा था घर के बड़े-बूढों ने

तब भी कुछ औरतें झाँकती थीं
घर के झरोखों-खिड़कियों-रोशनदानों से बाहर
कि मिल जाय अपनी सी ही कोई और
बहू-बेटी-भतीजी-भाभी-चाची
जिसे दिखा सकें वो अपनी गठरी में रखी कुछ नायाब चीज़ें,
जिनके बारे में कोई और कुछ भी नहीं जानता

यूँ तो औरतों का ज़ोर से हँसना भी मना हुआ करता था
और बिन बताए कहीं आने-जाने पर भी थी पाबंदी
उन्हें पहनाए गए थे- कमरबंद-पायल-पाजेब-चूडियाँ-कंगन और तमाम गहने
ज्यों हम बाँधते हैं- गाय-बैल-भैंसों के गले में घंटियाँ
कि उनके आने-जाने का पता चलता रहे
उनके मालिकों को

तब भी कुछ औरतें हँस ही लेती थीं
मुँह को दबाकर हथेलियों से,
और अपने ताम-झाम के साथ पहुँच ही जाती थीं
घर की छत-आँगन-देहरी या दालान पर
घूँघट को दबाये हुए दाँतों से,
झीनी से साड़ी के पीछे से
कोशिश करतीं थीं दुनिया को देखने की,

घर के बाहर झाँकने वाली ऐसी औरतों को
कहा जाता था- निर्लज्ज और बेहया
कुछ को दे दी जाती थी उपाधियाँ-
कुलटा-कुलच्छिनी-कलमुँही-कुजात की भी,

ज़्यादा हँसने वाली औरतों को
नहीं करती थीं घर की दूसरी औरतें भी पसंद,
उन्हें आता था गुस्सा कि 'वह' कैसे हँस सकती है-
निश्चिन्त और निर्द्वन्द्व ?
जबकि ऐसा करने की
उनकी हिम्मत नहीं होती थी कभी,

जिन  औरतों को दी जाती थीं ऐसी उपाधियाँ
उन्हें समझ में नहीं आता था
कि उन्होंने गलत क्या किया?
(क्योंकि उनको तो सोचने की भी नहीं थी इजाज़त
कि क्या ठीक है और क्या गलत?)

वो नहीं सोचती थीं कि उनके साथ हो रहा है कुछ गलत
या कि वे करने वाली हैं कोई 'अनुचित काम'
तोड़ने वाली हैं कोई नियम
या उल्लंघन कर रही है परम्पराओं का,
वे तो बिन सोचे-समझे और विचारे
कर बैठती थीं- "अपने दिल का कहा"
और बदनाम हो जाती थीं,

तब भी उनके मन में रखी रहस्यों की गठरी
खुल नहीं पाती थी किसी के भी सामने,
कोई नहीं जानता था कि ऐसा क्या है उसके अन्दर
जो न सोचने-समझने वाली औरतों में भी
भर देता है साहस 'अपने दिल का कहा' करने का
जबकि पुरुष भी ऐसा करने की हिम्मत कम ही कर पाता है

लाख कोशिशें की गयीं जानने की वह रहस्य
लिखी गयीं हज़ारों किताबें
किये गए सम्मेलन-गोष्ठियाँ-सेमीनार
लेकिन सब बेकार,
नहीं निकल पाया कोई निष्कर्ष,
न बन पाया कोई सिद्धांत

आज भी लोग परेशान से लगाते रहते हैं अनुमान कि क्या है उस गठरी में
जो छिपी है औरतों के अन्तस् में
और लगती जा रही हैं जिसमें गाँठों पर गाँठें

मुस्कुराती हैं निर्लज्ज और बेहया औरतें
(क्योंकि मुस्कुरा सिर्फ वही सकती हैं)
जबकि जानती हैं सभी स्त्रियाँ उनकी गठरी का रहस्य
इसीलिये
बिना कहे सभी औरतें जानती हैं सभी औरतों के दिल की बातें
और यह भी कि 'वह' क्या है, जो करा ही देता है
हर औरत को कभी न कभी 'दिल का कहा,'

निर्लज्ज औरतें इसे स्वीकार करती हैं
बाकी  सब रह जाती हैं चुप








शुक्रवार, 31 मई 2013

सिर्फ इतना भी काफी औरत होना था (चेतनक्रान्ति की एक कविता)

(चेतनक्रांति की कुछ कविताएँ मैंने उनकी पुस्तक 'शोकनाच' में पढ़ी थीं. पढीं क्या, बस एक सरसरी सी नज़र डाली थी. अपने दोस्त के साथ एक बार उनसे मिली भी, तो वे मुझे बेहद सहज, सरल और संकोची से व्यक्ति लगे. आज जब दोस्त ने उनकी ये कविता पढ़ने को दी, तो मैं इसे यहाँ शेयर करने से खुद को नहीं रोक पायी.
औरत  को पुरुषों की दृष्टि से देखना मुझे हमेशा से आकर्षित करता रहा है, इसलिए उनके द्वारा लिखी गयी कविताएँ अक्सर पढ़ती हूँ और समझने की कोशिश करती हूँ. ये कविता दो बार पढ़ चुकी हूँ, अभी शायद एक-दो बार और पढूं और समझने की कोशिश करूँ कि एक पुरुष औरतों के बारे  में क्या सोचता है? क्या उनके जैसा होना चाहता है? क्या 'मर्दानगी' की छवियों (स्टीरियोटाइप इमेज) में कभी उसका दम घुटता है?)

कुछ काम मैंने औरतों की तरह किए
कुछ नहीं, कई
और फिर धीरे-धीरे सारे
सबसे आखिर में जब मैं लिखने बैठा
मैंने कमर सीधी खड़ी करके
पंजों और ऐडि़यों को सीध में रखकर बैठना सीखा
इससे कूल्हों को जगह मिली
और पेट को आराम
उसने बाहर की तरफ जोर लगाना बन्द कर दिया
अब मैं अपने शफ़्फाफ नाखूनों को
आइने की तरह देख सकता था
और उँगलियों को
जो अब वनस्पति जगत का हिस्सा लग रही थीं
नहीं, मुझे फिर से शुरू करने दें
मैंने पहले औरतों को देखा
उनकी खुशबू को उनकी आभा को
जो उनके उठकर चले जाने के बाद कुछ देर
वहीं रह जाती थी
उनके कपड़ों को
जिनमें वे बिलकुल अलग दिखती थीं
मैंने बहुत सारी सुन्दर लड़कियों को देखा, और उनसे नहीं
उनके आसपास होते रहने को प्यार किया,
और फिर धीरे-धीरे नाखून पालिश को
लिपस्टिक को
पायल को
कंगन को
गलहार को
कमरबन्द को
और ऊँची ऐड़ी वाले सैंडिल को
उन तमाम चीजों को जो सिर्फ औरतों की थीं
और जो उन्हें मर्दों के अलावा बनाती थीं
मर्द जो मुझे नहीं पता किसलिए
बदसूरती को ताकत का बाना कहता था
और ताकत को देह का धर्म
मैंने बहुत सारे मर्दों को देखा
जब मेरे पास देखने के लिए सिर्फ वही रह गए थे
वे मोटरसाइकिल चला रहे थे
जो तीर की तरह तुम्हारे भीतर से निकलती थी
वे कविता भी लिख रहे थे
और उसे भी कुछ दिन बाद मोटरसाइकिल की तरह चलाने लगते थे
वे हर जगह कुछ न कुछ चलाते थे
जैसे सम्भोग में शिश्न को और दुनिया में हुकूमत को।
मैंने उन्हें खूब देखा
जब वे बलात्कार कर रहे थे
गर्भ चीर रहे थे
ओठों और योनियों को भालों से दो फाड़ कर रहे थे
मैंने उन्हें औरत होकर देखा
डरकर सहमते चुप रहते हुए
और उनके मामूलीपन को जानकर भी
कुछ न कहते हुए।
नहीं, मैं फिर भटक गया
मुझे मर्दों की बात ही नहीं करनी थी
मुझे थोड़े कम मर्दों की बात करनी थी
जैसा मैं था
और वे तमाम और जो मेरे जैसे थे
मुझे उनकी बात करनी थी
जो अपने मर्द होने से उकता उठे थे
मर्दानगी के ठसके पर जिन्हें मन्द-मन्द औरताना हँसी आने लगी थी
जो औरतों की सुन्दरता के शिकार हो गए थे
प्रेमी नहीं
उन्होंने उस सुन्दरता को ओढ़ लेना चाहा
अपने काँटों-कैक्टसों के ऊपर,
उन्होंने अपने कोनों को घिसा, गोल किया
और उन पर रंग लगाए अलग-अलग कई कई
और ध्वनियाँ कर्णप्रिय रूणुन-झुणुन और कणन-मणन।
मैंने एक स्कर्ट खरीदी जो कानों में कुछ कहती थी
एक साड़ी जिसका न आर था, न पार
एक जोड़ा रेशम के गुच्छे
जिनमें वे अपना गोपनीय रखती थीं
मैं यहीं रुक जाता अगर मुझे आगे रास्ता न दिखता
पर वहाँ एक राह थी जो आगे जाती थी
वहाँ जहाँ स्त्री थी
किसी दिन यूँ ही भूख की पस्ती में
वह मुझे अपने भीतर से आती लगी
फिर इसी तरह जब मैं बेमकसद घूमने निकल गया
और शहर की आपाधापी में जा फँसा
मुझे वापस अपने पीछे कहीं दूर अँधेरे के बाद एक उजास सी लगी
हालाँकि भीड़ इतनी थी कि मैं गर्दन घुमा नहीं सकता था।
वह मुझे दिखी
जिस सुबह मैं देर तक सिगरेट पीना भूला रहा
और रक्त बिना मुझे बताए
मेरी शिराओं को जगाने मेरे स्नायुओं को जिलाने लगा
मैंने अचानक टाँगें महसूस की
जो अन्यथा धुँए की गर्द में गुम रहती थीं
और मैं जानता नहीं था कि वे मेरे लिए क्या करती है।
लेकिन फिर एक दिन
घबराकर मैंने सिगरेट पी
और दफतर चला गया
यह अंत था
या शायद नहीं
फिर भी एक बार के लिए इतना औरत होना काफी था।

शनिवार, 16 मार्च 2013

औरतों के प्रश्न

औरतों के प्रश्न करते ही
हिल उठती हैं बुनियादें परिवारों की
चरमरा उठता है समाज का ढाँचा,
या तो ज़रूरत से ज़्यादा
विध्वंसक हैं स्त्री के प्रश्न
या कहीं अधिक खोखली और कमज़ोर है
नींव घर-परिवार और समाज की,

तो क्या करें?
प्रश्न उठाना छोड़ दें,
या तोड़ दें उन रवायतों को
जो उठ खड़ी होती हैं हर बार
औरतों के विरुद्ध
उनके अधिकारों के प्रश्न पर,

या कर लें समझौता उस व्यवस्था से
जो अपनी ही आधी आबादी के प्रति
अपनाती है दोहरा रवैया,
देकर उसे समाज में दोयम दर्ज़ा
छीन लेती है
प्रश्न करने का अधिकार।

शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

भगवान् बनाने वाले लोग

हाँ, ये सच है कि भगवानों ने बनाए हैं तमाम नियम
कि करना चाहिए किसको, कब, कहाँ और क्या?
लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो बनाते हैं भगवानों को
मूर्तियों में ढालते है उन्हें।
लोग आते हैं और खरीदते हैं ऊंचे दामों पर
फिर सजाते हैं शहर के पक्के घरों या भव्य देवालयों में
लाद देते हैं उन्हें सोने-चाँदी के गहनों से
चढ़ाते हैं लाखों का चढ़ावा और खिलाते हैं छप्पन भोग।

लेकिन जो लोग बनाते हैं भगवानों की मूर्तियाँ
पता नहीं मिलती है उन्हें दो वक्त की रोटी भी या नहीं
पता नहीं वे दुबारा देख पाते हैं अपनी निर्मितियों को या नहीं
देखी होती है सोने की चमक उन्होंने कभी अपनी ज़िंदगी में या नहीं

लोग, जो बनाते हैं मूरतें भगवानों की
रहा करते हैं वो शहर की तंग गलियों की झोपडियों में
उनके लिए भगवान् सिर्फ एक आइटम है
जिसे पूरा कर लिया जाना है एक निश्चित समय में...
वो पूजते नहीं उसे,
बनाकर एक ओर रख देते हैं।

लेकिन, एक बात तो पक्की है
कि जो लोग बनाते हैं भगवानों की मूरतें
वो भगवान् की भक्ति का सौदा नहीं करते
वो सौदा करते हैं अपने श्रम का, जो मूरत बनाने में खर्च हुआ।
उनके लिए भगवान् सिर्फ एक आइटम है
वो मुझसे, आपसे, सबसे ज्यादा धर्मनिरपेक्ष हैं।

बुधवार, 23 जनवरी 2013

सर्दी, धूप और सँकरी गलियों वाले मोहल्ले

अक्टूबर के महीने से होती है शुरू दुश्मनी
धूप की सँकरी गलियों वाले मुहल्लों से,
और उनमें बने मकानों में
धूप आना-जाना छोड़ देती है।

जब पॉश कालोनियों के बच्चे
गीज़र के गर्म पानी में नहाकर
टहलते हैं लॉन की हरी घास पर,
संकरी गलियों वाले मुहल्लों में-
-सूनी पड़ी होती है बालकनी
-पार्कों में सूख रहे होते हैं गीले कपड़े
-और बच्चे सड़कों पर उत्पात मचाते, खेल रहे होते हैं।

धूप चाहते हुए भी नहीं जा सकती है वहाँ,
म्युनिसपैलिटी वालों ने लगाई है रोक
धूप के गलियों में आने-जाने पर,
वो भी क्या करें?
नियम तो ऊपर से बने हैं
कि धूप, हवा, आसमान और ज़मीन
आदमी की 'औकात' के हिसाब से बाँटे जाएँ,
एल.आई.जी., एम.आई.जी., एच.आई.जी.
एक साथ नहीं हो सकते।

लेकिन,
म्युनिसपैलिटी, सरकार और नियमों के
लाख न चाहने के बावजूद,
पहुँच ही जाती है धूप की गर्मी
इन संकरी गलियों वाले मुहल्लों में-
-लोगों की बातचीत में
-बच्चों के खेल में
-बालकनी से बालकनी के सम्बन्ध में
महसूस होती है गर्मी।