शनिवार, 16 मार्च 2013

औरतों के प्रश्न

औरतों के प्रश्न करते ही
हिल उठती हैं बुनियादें परिवारों की
चरमरा उठता है समाज का ढाँचा,
या तो ज़रूरत से ज़्यादा
विध्वंसक हैं स्त्री के प्रश्न
या कहीं अधिक खोखली और कमज़ोर है
नींव घर-परिवार और समाज की,

तो क्या करें?
प्रश्न उठाना छोड़ दें,
या तोड़ दें उन रवायतों को
जो उठ खड़ी होती हैं हर बार
औरतों के विरुद्ध
उनके अधिकारों के प्रश्न पर,

या कर लें समझौता उस व्यवस्था से
जो अपनी ही आधी आबादी के प्रति
अपनाती है दोहरा रवैया,
देकर उसे समाज में दोयम दर्ज़ा
छीन लेती है
प्रश्न करने का अधिकार।

शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

भगवान् बनाने वाले लोग

हाँ, ये सच है कि भगवानों ने बनाए हैं तमाम नियम
कि करना चाहिए किसको, कब, कहाँ और क्या?
लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो बनाते हैं भगवानों को
मूर्तियों में ढालते है उन्हें।
लोग आते हैं और खरीदते हैं ऊंचे दामों पर
फिर सजाते हैं शहर के पक्के घरों या भव्य देवालयों में
लाद देते हैं उन्हें सोने-चाँदी के गहनों से
चढ़ाते हैं लाखों का चढ़ावा और खिलाते हैं छप्पन भोग।

लेकिन जो लोग बनाते हैं भगवानों की मूर्तियाँ
पता नहीं मिलती है उन्हें दो वक्त की रोटी भी या नहीं
पता नहीं वे दुबारा देख पाते हैं अपनी निर्मितियों को या नहीं
देखी होती है सोने की चमक उन्होंने कभी अपनी ज़िंदगी में या नहीं

लोग, जो बनाते हैं मूरतें भगवानों की
रहा करते हैं वो शहर की तंग गलियों की झोपडियों में
उनके लिए भगवान् सिर्फ एक आइटम है
जिसे पूरा कर लिया जाना है एक निश्चित समय में...
वो पूजते नहीं उसे,
बनाकर एक ओर रख देते हैं।

लेकिन, एक बात तो पक्की है
कि जो लोग बनाते हैं भगवानों की मूरतें
वो भगवान् की भक्ति का सौदा नहीं करते
वो सौदा करते हैं अपने श्रम का, जो मूरत बनाने में खर्च हुआ।
उनके लिए भगवान् सिर्फ एक आइटम है
वो मुझसे, आपसे, सबसे ज्यादा धर्मनिरपेक्ष हैं।

बुधवार, 23 जनवरी 2013

सर्दी, धूप और सँकरी गलियों वाले मोहल्ले

अक्टूबर के महीने से होती है शुरू दुश्मनी
धूप की सँकरी गलियों वाले मुहल्लों से,
और उनमें बने मकानों में
धूप आना-जाना छोड़ देती है।

जब पॉश कालोनियों के बच्चे
गीज़र के गर्म पानी में नहाकर
टहलते हैं लॉन की हरी घास पर,
संकरी गलियों वाले मुहल्लों में-
-सूनी पड़ी होती है बालकनी
-पार्कों में सूख रहे होते हैं गीले कपड़े
-और बच्चे सड़कों पर उत्पात मचाते, खेल रहे होते हैं।

धूप चाहते हुए भी नहीं जा सकती है वहाँ,
म्युनिसपैलिटी वालों ने लगाई है रोक
धूप के गलियों में आने-जाने पर,
वो भी क्या करें?
नियम तो ऊपर से बने हैं
कि धूप, हवा, आसमान और ज़मीन
आदमी की 'औकात' के हिसाब से बाँटे जाएँ,
एल.आई.जी., एम.आई.जी., एच.आई.जी.
एक साथ नहीं हो सकते।

लेकिन,
म्युनिसपैलिटी, सरकार और नियमों के
लाख न चाहने के बावजूद,
पहुँच ही जाती है धूप की गर्मी
इन संकरी गलियों वाले मुहल्लों में-
-लोगों की बातचीत में
-बच्चों के खेल में
-बालकनी से बालकनी के सम्बन्ध में
महसूस होती है गर्मी।

शनिवार, 22 सितंबर 2012

तुमने ही तो कहा था

हमें कहा गया कि कुछ भी करने से पहले
इजाज़त ली जाए उनकी
‘लड़कियाँ आज्ञाकारी होनी ही चाहिए’
किसी भी सूरत में,

हमने हर काम करने से पहले उनकी इजाज़त ली
ये बात और है कि किया वही जो दिल ने कहा
कि दिल और दिमाग
किसी और के कहने से नहीं चलते,
और कुछ 'सोचने' से पहले
इजाज़त लेने की बात भी नहीं थी।

हमें निर्देश दिया गया था
कि चलते समय ध्यान रखना
दो क़दमों के बीच का फासला
न हो एक फुट से ज्यादा
कि लड़कियाँ लंबी छलाँगें लगाती अच्छी नहीं लगतीं,  

हमने उनकी बात मानी
और उसी एक फुट के अन्दर
बसा ली अपनी दुनिया ,
कम से कम हमारी दुनिया अब
हमारे क़दमों के नीचे थी
और हमारे कदम भी ज़मीन पर।

जब हमने लिख दीं ये सारी बातें  
तो पकड़े गये
हम पर चला मुकदमा 'नियमों के उल्लंघन' का,
अपने ही विरुद्ध गवाही देने को बाध्य किया गया
जबकि ये बात संविधान के विरुद्ध थी,

पर हमने वो भी किया
अपने ही विरुद्ध गवाही दी,
और कहा कि सब कुछ काबू में था
जब तक हमने तुम्हारी हर बात मानी
अब, बात हद से आगे बढ़ गयी है,

अब तो मेरा ही अस्तित्व मेरी बात नहीं मानता,
अपने विरुद्ध जाने के लिए हमसे
तुमने ही तो कहा था।

शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

लड़कियाँ और कुकुरमुत्ते


(2001 की जनगणना के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश में हमारे गृह जनपद आजमगढ़ में लिंगानुपात सबसे अधिक थी. (2011 के आंकड़े नहीं जानती)आमतौर पर हम ये बात बड़ी शान के साथ बताते थे, लेकिन गाँवों में जब लड़कियों की हालत देखी, तो लगा कि हम भले ही लड़कियों को कोख में मारते ना हों, लेकिन उन्हें पैदा भी नहीं करते. वो तो खुद ब खुद पैदा हो जाती हैं और खुद ही पलती-बढ़ती जाती हैं. तभी ये कुछ पंक्तियाँ लिखीं थीं, जिन्हें ब्लॉग पर भी लगाया था. आज दुबारा पोस्ट कर रही हूँ.)

लड़कियाँ गाँधीजी के तीन बंदरों का
जीवंत प्रतिरूप हैं
न देखती हैं ,न सुनती हैं ,न कहती हैं
लड़कियाँ पाली नहीं जाती
कूड़े के ढेर पर पलने वाले कुकुरमुत्तों की तरह
ख़ुद ही पलती और बढती रहती हैं।

लड़कियाँ बहनें ,बेटियाँ ,पत्नी और माँ हैं
लड़कियाँ ख़ुद कहाँ हैं?

कोई नहीं सोचता
कि लड़कियाँ सोच सकती हैं
इसलिए उनकी कोई पसंद, कोई ख़्वाहिश नहीं होती।

लड़कियों को बताया जाता है
कि वे सोचने के लिए नहीं करने के लिए हैं
और इसीलिए
लड़कियाँ करती रहती हैं
झाडू ,पोछा ,बर्तन,खाना
जो भी उनसे कहा जाता है।
शादी से पहले पिता के घर
शादी के बाद पति के यहाँ बस करती ही रहती हैं,
न देखती हैं ,न सुनती हैं ,न कहती हैं
कूड़े के ढेर पर उगने वाले कुकुरमुत्तों की तरह
उगती ,पलती ,बढती और मरती रहती हैं। ... ...

सोमवार, 27 अगस्त 2012

आलोक धन्वा और विजय सिंह की दो कवितायें

(अपने शोध-कार्य में व्यस्त होने के कारण कम ही कविताएँ पढ़ पाती हूँ, लेकिन कभी-कभी कोई कविता इतनी अच्छी लगती है कि उसे सबको पढ़ाने का मन होता है. पिछले दिनों एक लड़की के 'भागने' को लेकर एक उच्च पड़ पर बैठे पुलिस अधिकारी का विवादास्पद बयान मीडिया में ख़बरों में था. हमेशा की तरह लोग उस बात को भूल गए. मैं भी भूल गयी थी. आज फिर से ये दोनों कविताएँ पढीं, तो मुझे वो प्रसंग याद आ गया. कितनी प्रासंगिक हैं ये कविताएँ)


भागी हुई लड़कियां / आलोक धन्वा
-------------------------------
अगर एक लड़की भागती है
तो यह हमेशा जरूरी नहीं है
कि कोई लड़का भी भागा होगा

कई दूसरे जीवन प्रसंग हैं
जिनके साथ वह जा सकती है
कुछ भी कर सकती है
महज जन्म देना ही स्त्री होना नहीं है

तुम्हारे उस टैंक जैसे बंद और मजबूत
घर से बाहर
लड़कियां काफी बदल चुकी हैं
मैं तुम्हें यह इजाजत नहीं दूंगा
कि तुम उसकी सम्भावना की भी तस्करी करो

वह कहीं भी हो सकती है
गिर सकती है
बिखर सकती है
लेकिन वह खुद शामिल होगी सब में
गलतियां भी खुद ही करेगी
सब कुछ देखेगी शुरू से अंत तक
अपना अंत भी देखती हुई जाएगी
किसी दूसरे की मृत्यु नहीं मरेगी

तुम
जो
पत्नियों को अलग रखते हो
वेश्याओं से
और प्रेमिकाओं को अलग रखते हो
पत्नियों से
कितना आतंकित होते हो
जब स्त्री बेखौफ भटकती है
ढूंढती हुई अपना व्यक्तित्व
एक ही साथ वेश्याओं और पत्नियों
और प्रमिकाओं में !

अब तो वह कहीं भी हो सकती है
उन आगामी देशों में
जहां प्रणय एक काम होगा पूरा का पूरा

कितनी-कितनी लड़कियां
भागती हैं मन ही मन
अपने रतजगे अपनी डायरी में
सचमुच की भागी लड़कियों से
उनकी आबादी बहुत बड़ी है

क्या तुम्हारे लिए कोई लड़की भागी?

वह कोई पहली लड़की नहीं है
जो भागी है
और न वह अन्तिम लड़की होगी
अभी और भी लड़के होंगे
और भी लड़कियां होंगी
जो भागेंगे मार्च के महीने में

लड़की भागती है
जैसे फूलों गुम होती हुई
तारों में गुम होती हुई
तैराकी की पोशाक में दौड़ती हुई
खचाखच भरे जगमग स्टेडियम में


भागती हुई लडकियां/ विजय सिंह
----------------------
भागती हुई लडकियां
अब भी भाग रही हैं
और
नए साल में भी भागेंगी
खूब भागेंगी
कहीं वह पानी की तरह
किसी को भिगोते हुए भागेंगी
तो कहीं हवा की तरह


लेकिन यह तय है
लडकियां जब भी भागेंगी

धरती की एक नयी आजादी के लिये
भागेंगी

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2011

मेरे दोस्त

मैं खुद को आज़ाद तब समझूँगी
जब सबके सामने यूँ ही
लगा सकूँगी तुम्हें गले से
इस बात से बेपरवाह कि तुम एक लड़के हो,
फ़िक्र नहीं होगी
कि क्या कहेगी दुनिया?
या कि बिगड़ जायेगी मेरी 'भली लड़की' की छवि,
चूम सकूँगी तुम्हारा माथा
बिना इस बात से डरे
कि जोड़ दिया जाएगा तुम्हारा नाम मेरे नाम के साथ
और उन्हें लेते समय
लोगों के चेहरों पर तैर उठेगी कुटिल मुस्कान

जब मेरे-तुम्हारे रिश्ते पर
नहीं पड़ेगा फर्क
तुम्हारी या मेरी शादी के बाद,
तुम वैसे ही मिलोगे मुझसे
जैसे मिलते हो अभी,
हम रात भर गप्पें लड़ाएँगे
या करेंगे बहस
इतिहास-समाज-राजनीति और संबंधों पर,
और इसे
तुम्हारे या मेरे जीवनसाथी के प्रति
हमारी बेवफाई नहीं माना जाएगा

वादा करो मेरे दोस्त!
साथ दोगे मेरा,
भले ही ऐसा समय आते-आते
हम बूढ़े हो जाएँ,
या खत्म हो जाएँ कुछ उम्मीदें लिए
उस दुनिया में
जहाँ रिवाज़ है चीज़ों को साँचों में ढाल देने का,
दोस्ती और प्यार को
परिभाषाओं से आज़ादी मिले.