बुधवार, 23 दिसंबर 2009

तुम्हारा आना

(एक सच्चा प्यार किस तरह से किसी के अन्दर पूरी इन्सानियत के प्रति आस्था पैदा कर देता है...इस बात को व्यक्त करती सात साल पहले लिखी एक कविता...)

मेरी ज़िन्दगी में तुम्हारे आने से
कुछ बदल गया है
बदल गये हैं गीतों के मायने
वो मन की गहराइयों तक
उतरने लगे हैं
देने लगे हैं आवाज़
मेरी भावनाओं को
मानो मेरी ही बातें
कहने लगे हैं,
बदल गया है मौसम का अन्दाज़
वो बातें करता है मुझसे
चिड़ियों के चहकने से
बारिश के रिमझिम से
मेरे साथ हँसता-रोता है मौसम
पहले सा नहीं रहा,
बदल गयी मेरे पाँवों की थिरकन
मेरा बोलना, मेरा देखना
मैं खुद को ही अब
पहचान नहीं पाती
सब बदल गया है,
मेरी ज़िन्दगी में तुम्हारे आने से
कुछ नया हुआ है
पहले की तरह अब
नहीं लगता डर मुझे
पुरुषों पर
कुछ-कुछ विश्वास हो चला है.

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

पर... ... माँ

ग़लती करती
तो डाँट खाती
दीदी से भी
और बाबूजी से भी
सब सह लेती
पर
सह न पाती माँ
तुम्हारा एक बार
गुस्से से आँखें तरेरना
..........................
कई तरह की
सज़ाएँ पायीं
मार भी खायी
कई बार
पर
नहीं भूलती माँ
तुम्हारी वो अनोखी सज़ा
कुछ भी न कहना
सभी काम करते जाना
एक लम्बी
चुप्पी साध लेना
........................
बाबूजी का लाड़
अपने जैसा था
भाई का प्यार भी
अनोखा था
बहन के स्नेह का
कोई सानी नहीं
पर
इन सबसे बढ़कर था माँ
थपकी देकर
सुलाते हुये तुम्हारा
मेरे सिर पर
हाथ फेरना.
......................

बुधवार, 16 दिसंबर 2009

सन्नाटा

चारों तरफ़ सन्नाटा है
हालाँकि शोरगुल भी है
नारे भी हैं
चीखती-चिल्लाती आवाज़ें भी हैं
फिर भी सन्नाटा है
इसलिये कि
आवाज़ें नहीं उठतीं सबके लिये
उठती हैं सिर्फ़ अपने लिये,
इसलिये कि
कोई आवाज़
नहीं उठती उनके खिलाफ़
जिन्होंने खरीद लिया है
सभी की आवाज़ों को
अलग-अलग तरीकों से,
हम सभी की आवाज़ें
बिक गयी हैं
किसी न किसी के हाथों
हम सभी हो गये हैं गूँगे
और बेआवाज़
इसीलिये चारों तरफ़
सन्नाटा ही सन्नाटा है.

शनिवार, 5 दिसंबर 2009

एक नारी की कविता

मेरी कविता
सायास नहीं बनायी जाती
भर जाता है जब
मन का प्याला
लबालब
भावों और विचारों से
तो निकल पड़ती है
अनायास यूँ ही
पानी के कुदरती
सोते की तरह
और मैं
रहने देती हूँ उसे
वैसे ही
बिना काटे
बिना छाँटे
मेरी कविता
अनगढ़ है
गाँव की पगडंडी के
किनारे पड़े
अनगढ़ पत्थर की तरह
आसमान में
बेतरतीब बिखरे
बादलों की तरह
जंगल में
खुद से उग आयी
झाड़ी के फूलों की तरह
अधकचरे अमरूद के
बकठाते स्वाद की तरह
मेरी कविता
नहीं मानना चाहती
शैली, छन्द और
लयों के बंधन
मेरी कविता
जैसी है
उसे वैसी ही रहने दो
सदियों से रोका गया है
बांध और नहरें बनाकर
आज
पहाड़ी नदी की तरह
ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर
उद्दाम वेग से बहने दो
बनाने दो उसे
खुद अपना रास्ता
टूटी-फूटी भाषा में
जो मन में आये
कहने दो.

बुधवार, 2 दिसंबर 2009

हीरा

अपने बाबूजी की थी मैं
अनगढ़ हीरा
सँवारा,तराशा बनाया मुझे,
बनाकर मुझको
एक अनमोल हीरा
अपनी ही चमक से
चमकाया मुझे,
अपने माँ की थी मैं
जिद्दी बिटिया
डाँटा-डपटा, समझाया मुझे,
दुनियादारी की बातें बताकर
रानी बिटिया
बनाया मुझे,
जब बड़ी हुयी तो
बड़े जतन से
ऊँचे घराने में ब्याहा मुझे,
ससुराल आकर
कहीं खो गयी मैं,
मैं, मैं न रही
कुछ और हो गयी मैं,
मैं थी कहीं का पौधा
कहीं और
गड़ गयी हूँ,
ससुराल के कीमती गहनों में
जड़ गयी हूँ.

सोमवार, 30 नवंबर 2009

औरत पागल होती है (emotional fool)

तुमने नहीं किया वादा
ज़िन्दगी भर साथ निभाने का
फिर भी उसने
तुम्हारा साथ दिया,
प्यार करता हूँ
ये भी नहीं कहा तुमने
पर उसने शिद्दत से
तुम्हें प्यार किया
तुमने नहीं कहा
लौट के आने के लिये
तब भी उसने
इन्तज़ार किया
मिल गया तुम्हें कोई और साथी
पर उसे तुमसे शिकायत नहीं
अब भी वह
आस लगाये बैठी है
कि तुम कभी तो
कह दो उससे
कि तुमने
एक पल के लिये सही
एक बार उसे प्यार किया
मैं खीझ जाती हूँ
उसकी दीवानगी पर
धोखे पर धोखा खाती है
पर प्रेम में पागल हुई
जाती है
फिर सोचती हूँ
कि ये पागलपन न होता
तो कितने दिन चलती दुनिया,
छली पुरुष से त्रस्त
ये सृष्टि
औरतों के प्यार पर ही तो टिकी है
धोखा खाती है
और प्यार करती है
दर्द सहती है
और सृजन करती है
हाँ,
औरत पागल होती है
दीवानी होती है.

गुरुवार, 26 नवंबर 2009

मेरी बच्ची

तुझे दूँगी वो सारी खुशियाँ
जो मुझे नहीं मिलीं
तेरी ज़िन्दगी को
ऐसे मैं संवारुँगी
तुझे रखूँगी
पलकों की छाँव में
ग़म की हर धूप से
बचा लूँगी
कैसे बचाउँगी
शैतानों की नज़रों से तुझे
अभी से सोचकर
डर लगता है
कि मेरी ही तरह तुझे भी
जाने क्या-क्या सहना होगा
पर अपनी पहचान बनाने के लिये
मेरी बच्ची
तुझे खुद ही लड़ना होगा
ज़िन्दगी की
कड़वी सच्चाइयाँ
रुलायेंगी तुझे
पर वे ही मुझ जैसा
मजबूत बनायेंगी तुझे