कल रात
बड़ी मुश्किल से टूटा
मेरे हाथ से रोटी का कौर
सब्जी मुँह में पड़ते ही
ज़हर सी लगी,
रेडियो में आ रही थी ख़बर
भूख से मरने वालों की ,
मेरी आँखों में पानी आ गया
और मुँह से निकली इक आह
कि हे ईश्वर,
तू या तो सबको भरपेट खाना देता
या मुझे देता सामर्थ्य
उनकी मदद करने की,
ये सोचते-सोचते मैंने
पूरा खाना खा लिया,
और मुझे मालूम है
कि मैं उसे पचा भी लूँगी ,
ठीक उसी तरह
जैसे उस ख़बर को पचा लिया,
क्योंकि ...भूख से मरने वालों की ख़बर
हमारे लिए सिर्फ़ ख़बर है
जिसे हम सुनते हैं
अफ़सोस ज़ाहिर करते हैं
और भूल जाते हैं ।
मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009
रविवार, 8 फ़रवरी 2009
चलो मीठा सा गीत कोई गुनगुनाएं
जाके बीते ज़माने में आज फिर से /चलो बचपन की यादों को बीन लायें /भूलकर ज़िंदगी की परेशानियाँ /चलो मीठा सा गीत कोई गुनगुनाएं /.......चलो पलटें पुरानी किताबों को आज /बिछड़े यारों की फोटो को फिर से देखें ,/बंद हैं घर के बक्से में बरसों से जो /उन चिठ्ठियों और कार्डों को फिर से देखें ,/अपनी बगिया के फूलों को पानी डालें /छत पे जाकर कबूतर को दाना खिलाएं ,/चलो मीठा सा गीत कोई गुनगुनाएं ... ... /दम घुटता रहा साँस फूलती रही /पिछले दरवाजे को कब से खोला नहीं ,/रात में आँसू बनकर बहती है जो /बात दिल में रही कभी बोला नहीं ,/खोलकर आज दिल के दरवाजों को /ताजी हवा के झोकों में झूम जायें, /चलो मीठा सा गीत कोई गुनगुनाएं ... ।
शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009
औरत होने का सुख
भीगी आँखों के /धुंधले परदे के पीछे से /मैंने देखा था /उसकी भी आँखें /गीली थीं /पर वो ठहरा मर्द /रोता कैसे ?/ तो पी गया वो /अपने सारे आँसू/पर मैं रोई /रो -रोकर /अपने ख़त्म होते रिश्ते के /दर्द को मैंने /आँसुओं में बहा दिया /और ...पहली बार /अपने औरत होने का सुख /महसूस किया /रोना ,फूट-फूटकर रोना /यही तो औरतें / आज़ादी से कर पाती हैं /और शायद / इसी कारण /बड़ा से बड़ा दर्द / सह जाती हैं।
बुधवार, 4 फ़रवरी 2009
संस्कृति के पहरुए
संस्कृति रक्षा के नाम पर /युवतियों का सरेआम अपमान करने वालों /पहले भारतीय संस्कृति को जानो /तुम प्रेम का विरोध करते हो /तो जाओ अभिज्ञान शाकुंतलम पढ़ो/जो विश्व -प्रसिद्ध /उन्मुक्त प्रेम की गाथा है /'अमरुक -शतक 'पढ़ो /जिसका एक-एक छंद /प्रेमरस से भरी रसभरी है /और जो संस्कृत काव्यशास्त्रियों की /आँख का तारा है/ मदिरा का विरोध करते हो /तो पहले वेद पढ़ो /जहाँ सोम की देवता के रूप में /स्तुति की गई है /और .../शंकर भगवान् को /भंग -धतूरा चढ़ाना छोड़ दो /जाओ चुनाव लड़ो/सरकार बनाओ /और कर दो शराब -बंदी /पूरे राज्य में /सारे ठेकों के लाइसेंस /जब्त कर लो /जो भी करो /इस लोकतान्त्रिक देश में /सब जायज है /अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर /पर इसकी सीमा /तुम्हारी नाक के आगे/ख़त्म हो जाती है/... ...प्रेम तो मानव की स्वाभाविक प्रवृत्ति है /संस्कृति रक्षा के नाम पर /इस पावन भावना को /मत रोको /याद रखो /प्रेम करने वाले /आतंकवादी ,बलात्कारी ,या हत्यारे /नहीं होते /और इससे पहले /कि तुम्हारे हमलों कि प्रतिक्रिया में /वे ऐसे हो जाएँ /प्रेम पर पहरा लगना /बंद कर दो।
ग्लोबल वार्मिंग
संबंधों के बीच से /गरमी उड़ गई /उड़कर हवाओं में घुल गई /अब सुन रहे हैं वातावरण की /हो रही है ग्लोबल वार्मिंग /जिसके लिए दुनिया के ठेकेदार /कर रहे हैं मीटिंग /दुनिया को गर्म होने से कैसे बचाएं /सब के मन में यही सवाल है /पर उस ओर नहीं किसी का ध्यान है /कि जहाँ संबंधों में गर्माहट /जितनी कम है /वहाँ की हवा उतनी ही गर्म है /और चूँकि हवाओं के लिए /कोई सीमा नहीं / वे चल देती हैं उस ओर /जहाँ की हवा अभी ठंडी है / और संबंधों में गर्मी है /धीरे -धीरे ऐसे ही /धरती गर्म होती जायेगी /और... ... /उत्तरी ध्रुव पर पिघलने वाली बर्फ /संबंधों के बीच जम जायेगी ।
सोमवार, 26 जनवरी 2009
लालकिला और केवट -बस्ती
टूटी खटिया,फूटी हाँडी/एक अदद फटी कथरी /जिस पर हर हफ्ते ही /पैबंद लगाया जाता है ।/ पेट फुलाए, दुबले -पतले /गंदे -अधनंगे बच्चे /जिनको इस एक कथरी पर /इक साथ सुलाया जाता है । /दिन भर में बस एक जून ही /घर में खाना पकता है /दिन भर में बस एक बार /ये चूल्हा जलाया जाता है। /देश चलाने वालों एक दिन /केवट -बस्ती में आकर देखो /घोर अभावों में भी जीवन /कैसे बिताया जाता है। / राजपथ पर परेड भी होगी /झाँकी होगी ,बाजे भी /इन्हें नहीं मालूम /गणतंत्र दिवस कैसे मनाया जाता है। लालकिले से केवट -बस्ती की /दूरी को जल्दी पाटो/बापू का इक मन्त्र आज/फिर -फिर यह दोहराता है ।
शुक्रवार, 23 जनवरी 2009
योग्यतम की उत्तरजीविता
ज़िन्दा रहने के लिए /मनुष्य के शरीर को /चाहिए ऊर्जा /ऊर्जा के लिए भोजन / और भोजन के लिए ईंधन/ईंधन के लिए है लकड़ी की ज़रूरत /और इसीलिये /हरे पेड़ों का कटना जारी है /यही है योग्यतम की उत्तरजीविता /कि किसी एक के ज़िन्दा रहने के लिए /किसी दूसरे का मरना ज़रूरी है .
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