शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

तुम्हारे लिए ...

धरती पर
लहलहाती हैं फसलें,
बिखरती है सुगंध
गेहूं के बालियों की
यहाँ से वहाँ
तुम्हारे लिए

पहाड़ों ने
बिछाये हैं गलीचे
हरी घास के,
उनकी घाटियों से
उठता है धुआँ
तुम्हारे लिए

सागर के
उस छोर तक दिखता,
दूर तक फैला
गिरता-उठता
लहरों का कारवां
तुम्हारे लिए

बरसात में
घिरती हैं घटाएँ,
आकाश से
बरसती हैं धीरे-धीरे
मोती की लड़ियाँ
तुम्हारे लिए

पूनम की रात
चाँद-तारों से सजकर,
ओढ़कर चाँदनी को
नदी की रेत पर
करती है अठखेलियाँ
तुम्हारे लिए

सूरज भी
अपनी किरणों को लेकर,
रोशनी में
डुबो देता है सुबह
सारा जहाँ
तुम्हारे लिए

मैं रहूँ ना रहूँ
मेरी आवाज़ मगर
गूँजा करेगी,
कुदरत के नजारों में
होगा मेरा निशां
तुम्हारे लिए


(बहुत पहले टी.वी. पर एक धारावाहिक आता था. उसका टाइटिल गीत 'तुम्हारे लिए' मुझे बहुत अच्छा लगा था. उसी पर आधारित ये कविता लगभग दस साल पहले किसी के लिए लिखी थी. सोचा था कि इसे कभी सार्वजनिक नहीं करूँगी, पर जाने क्यों आज इसे यहाँ लिखने का मन हुआ, तो प्रकाशित कर दिया...)

23 टिप्पणियाँ:

सागर ने कहा…

और वो याद है, स्वाभिमान, शांति, युग, फ़र्ज़, जूनून का गाना ? एक और अलिफ़ लैला ?

shikha varshney ने कहा…

वाह वाह वाह ..वो गीत जितना खूबसूरत था तुम्हारी कविता भी कुछ कम नहीं.

राजेश उत्‍साही ने कहा…

सचमुच जब तक कोई एक 'हमारा' न हो यह दुनिया सूनी सूनी लगती है। किसी ऐसे एक के जिन्‍दगी में आते ही सारी दुनिया केवल 'तुम्‍हारे लिए' में बदल जाती है। दस साल बहुत होते हैं। अब तक इसे केवल 'निजी' बनाकर रखा,बहुत धीरज चाहिए।
बहरहाल कविता बहुत कुछ कहती है।

sada ने कहा…

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों का संगम है इस रचना में ।

दीप्ति शर्मा ने कहा…

kya bat hai
bahut khub
khubsurat rachna
...

दीप्ति शर्मा ने कहा…

mere blog par
"main"
kabhi yaha bhi aaye
...

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

मैं रहूँ ना रहूँ
मेरी आवाज़ मगर
गूँजा करेगी,
कुदरत के नजारों में
होगा मेरा निशां
तुम्हारे लिए

बहुत सुंदर पंक्तियां !

रश्मि प्रभा... ने कहा…

मैं रहूँ ना रहूँ
मेरी आवाज़ मगर
गूँजा करेगी,
कुदरत के नजारों में
होगा मेरा निशां
तुम्हारे लिए
....
bahut hi gahre snehil ehsaas

Kailash C Sharma ने कहा…

मैं रहूँ ना रहूँ
मेरी आवाज़ मगर
गूँजा करेगी,
कुदरत के नजारों में
होगा मेरा निशां
तुम्हारे लिए

प्रेम की बहुत गहन और भावपूर्ण प्रस्तुति..

nilesh mathur ने कहा…

बहुत ही सुन्दर!

rashmi ravija ने कहा…

बड़े प्यारे अहसास लिए हुए है कविता...

अल्पना वर्मा ने कहा…

मैं रहूँ ना रहूँ
मेरी आवाज़ मगर
गूँजा करेगी,
कुदरत के नजारों में
होगा मेरा निशां
तुम्हारे लिए

-सच..बेहद भावपूर्ण अभिव्यक्ति..

Mithilesh dubey ने कहा…

बहुत दिनों बाद आपको पढ़ा अच्छा लगा । मेरे ब्लोग का ऐड्रेस ये है http://mithileshdubey.blogspot.com

अनिल कान्त ने कहा…

:)

Shikha Deepak ने कहा…

सारा जहाँ
तुम्हारे लिए.............ख़ूबसूरत कविता।

SEEMA ने कहा…

seema
आपका ब्लॉग राजस्थान पत्रिका में पिछले बुधवार को पढ़ा ! प्रेम का अहसास कभी नहीं दबता फिर चाहे दस साल हो या बीस| चाहते हुआ भी उससे बात नहीं करते है उससे मिलते नहीं है पर उसके बारे में अक्सर सोचते है जुदा होकर भी जुदा नहीं होते उसका इन्तजार रहता है कभी शायद भूले भटके भेंट हो जाये | क्यों उसकी याद तडपाती है ............
..

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

मैं रहूँ ना रहूँ
मेरी आवाज़ मगर
गूँजा करेगी,
कुदरत के नजारों में
होगा मेरा निशां
तुम्हारे लिए


kya kahne hain!!

khubsurat!!

Parul ने कहा…

mukti,jiske liye bhi likhi hai.dil se likhi hai. :)

रचना दीक्षित ने कहा…

क्या बात ?? क्या बात ?? क्या बात ??सुंदर कोमल भावनाएं उतने ही कोमल अहसास

Arvind Mishra ने कहा…

मन को छूती कविता -अब बसंत आन पहुंचा!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

मैं रहूँ ना रहूँ
मेरी आवाज़ मगर
गूँजा करेगी,
कुदरत के नजारों में
होगा मेरा निशां
तुम्हारे लिए

बहुत ही अच्छे समर्पण का भाव लिए है आपकी रचना ... प्रेम की भीनी सुगंध है इन शब्दों में ...

Meenu Khare ने कहा…

Very good poem.

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

बहुत अच्छी लगी यह कविता।