धरती पर
लहलहाती हैं फसलें,
बिखरती है सुगंध
गेहूं के बालियों की
यहाँ से वहाँ
तुम्हारे लिए
पहाड़ों ने
बिछाये हैं गलीचे
हरी घास के,
उनकी घाटियों से
उठता है धुआँ
तुम्हारे लिए
सागर के
उस छोर तक दिखता,
दूर तक फैला
गिरता-उठता
लहरों का कारवां
तुम्हारे लिए
बरसात में
घिरती हैं घटाएँ,
आकाश से
बरसती हैं धीरे-धीरे
मोती की लड़ियाँ
तुम्हारे लिए
पूनम की रात
चाँद-तारों से सजकर,
ओढ़कर चाँदनी को
नदी की रेत पर
करती है अठखेलियाँ
तुम्हारे लिए
सूरज भी
अपनी किरणों को लेकर,
रोशनी में
डुबो देता है सुबह
सारा जहाँ
तुम्हारे लिए
मैं रहूँ ना रहूँ
मेरी आवाज़ मगर
गूँजा करेगी,
कुदरत के नजारों में
होगा मेरा निशां
तुम्हारे लिए
(बहुत पहले टी.वी. पर एक धारावाहिक आता था. उसका टाइटिल गीत 'तुम्हारे लिए' मुझे बहुत अच्छा लगा था. उसी पर आधारित ये कविता लगभग दस साल पहले किसी के लिए लिखी थी. सोचा था कि इसे कभी सार्वजनिक नहीं करूँगी, पर जाने क्यों आज इसे यहाँ लिखने का मन हुआ, तो प्रकाशित कर दिया...)

23 टिप्पणियाँ:
और वो याद है, स्वाभिमान, शांति, युग, फ़र्ज़, जूनून का गाना ? एक और अलिफ़ लैला ?
वाह वाह वाह ..वो गीत जितना खूबसूरत था तुम्हारी कविता भी कुछ कम नहीं.
सचमुच जब तक कोई एक 'हमारा' न हो यह दुनिया सूनी सूनी लगती है। किसी ऐसे एक के जिन्दगी में आते ही सारी दुनिया केवल 'तुम्हारे लिए' में बदल जाती है। दस साल बहुत होते हैं। अब तक इसे केवल 'निजी' बनाकर रखा,बहुत धीरज चाहिए।
बहरहाल कविता बहुत कुछ कहती है।
बहुत ही सुन्दर शब्दों का संगम है इस रचना में ।
kya bat hai
bahut khub
khubsurat rachna
...
mere blog par
"main"
kabhi yaha bhi aaye
...
मैं रहूँ ना रहूँ
मेरी आवाज़ मगर
गूँजा करेगी,
कुदरत के नजारों में
होगा मेरा निशां
तुम्हारे लिए
बहुत सुंदर पंक्तियां !
मैं रहूँ ना रहूँ
मेरी आवाज़ मगर
गूँजा करेगी,
कुदरत के नजारों में
होगा मेरा निशां
तुम्हारे लिए
....
bahut hi gahre snehil ehsaas
मैं रहूँ ना रहूँ
मेरी आवाज़ मगर
गूँजा करेगी,
कुदरत के नजारों में
होगा मेरा निशां
तुम्हारे लिए
प्रेम की बहुत गहन और भावपूर्ण प्रस्तुति..
बहुत ही सुन्दर!
बड़े प्यारे अहसास लिए हुए है कविता...
मैं रहूँ ना रहूँ
मेरी आवाज़ मगर
गूँजा करेगी,
कुदरत के नजारों में
होगा मेरा निशां
तुम्हारे लिए
-सच..बेहद भावपूर्ण अभिव्यक्ति..
बहुत दिनों बाद आपको पढ़ा अच्छा लगा । मेरे ब्लोग का ऐड्रेस ये है http://mithileshdubey.blogspot.com
:)
सारा जहाँ
तुम्हारे लिए.............ख़ूबसूरत कविता।
seema
आपका ब्लॉग राजस्थान पत्रिका में पिछले बुधवार को पढ़ा ! प्रेम का अहसास कभी नहीं दबता फिर चाहे दस साल हो या बीस| चाहते हुआ भी उससे बात नहीं करते है उससे मिलते नहीं है पर उसके बारे में अक्सर सोचते है जुदा होकर भी जुदा नहीं होते उसका इन्तजार रहता है कभी शायद भूले भटके भेंट हो जाये | क्यों उसकी याद तडपाती है ............
..
मैं रहूँ ना रहूँ
मेरी आवाज़ मगर
गूँजा करेगी,
कुदरत के नजारों में
होगा मेरा निशां
तुम्हारे लिए
kya kahne hain!!
khubsurat!!
mukti,jiske liye bhi likhi hai.dil se likhi hai. :)
क्या बात ?? क्या बात ?? क्या बात ??सुंदर कोमल भावनाएं उतने ही कोमल अहसास
मन को छूती कविता -अब बसंत आन पहुंचा!
मैं रहूँ ना रहूँ
मेरी आवाज़ मगर
गूँजा करेगी,
कुदरत के नजारों में
होगा मेरा निशां
तुम्हारे लिए
बहुत ही अच्छे समर्पण का भाव लिए है आपकी रचना ... प्रेम की भीनी सुगंध है इन शब्दों में ...
Very good poem.
बहुत अच्छी लगी यह कविता।
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