बृहस्पतिवार, 28 अक्तूबर 2010
उनके विरुद्ध मचलते शब्द
ऐसा नहीं कि उन्हें स्त्रीत्व और स्त्री सुलभता के बीच का
अंतर नहीं मालूम,
वे जानबूझकर भ्रम पैदा करते हैं,
स्त्री को स्त्रीत्व से दूर कर
स्त्री सुलभता के खाँचे में फिट करते हैं.
वे शब्दों को इस्तेमाल करते हैं
हथियार की तरह,
चिपचिपे शब्दों से
बुनते हैं जाले, जिनमें शिकार फँस जाता है
और वे मकड़ी के जैसे बच जाते हैं.
वे बहुअर्थी शब्दों से बनाते हैं गूढ़ सूत्र
और फिर करते हैं उनकी
मनमानी व्याख्याएं,
बदलते समय के साथ-साथ
शब्दों की परिभाषाएँ बदलते जाते हैं.
ऐसा नहीं है कि उन्हें
नए शब्दों के उगने का पता नहीं चलता,
वे कुचल देना चाहते हैं उन्हें
मजबूत बनने से पहले.
उन्हें आदत है
हाशिए पर पड़े शब्दों की चीखें अनसुनी कर देने की
वे उन्हें खड़े नहीं होने देंगे
अपने साथ, कभी भी.
उन्हें आदत है हर चीज़ का पिरामिड बना देने की
वे उन्हें समतल नहीं होने देंगे,
हर बात को ऊर्ध्वाधर रखने वाले
उसका क्षैतिज विस्तार नहीं होने देंगे.
बावजूद इसके
उनके पिरामिड में सदियों से नीचे पड़े शब्द
मचल रहे हैं,
उन्हें नहीं पता कि अब
शब्द खुद अपने अर्थ बदल रहे हैं.
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21 टिप्पणियाँ:
चिन्तन की नई दिशा की ओर इशार
सच उत्तम रचना है
मिसफ़िट:सीधी बात
शब्द कभी चुप नहीं रहते।
मैं कविता के क्षेत्र में अनाडी हूँ ,हाँ तनिक सा कविता प्रेमी जरुर हूँ ..
अगर आपकी इस कविता को लेकर यह विवेचित हो कि कविता क्या है तब निश्चय ही आनद की निष्पत्ति होगी -
आईये इक उसी आनंदानुभूति का जुगाड़ करें -
कविता क्या है -
क्या महज उक्ति वैचित्र्य ?
या बिम्बों और सूक्ष्म संकेतों से कोई बड़ी बात कहने की कला ?
या फिर गहरी अनुभूतियों का सहज प्रगटीकरण ?
या फिर व्यष्टि का समष्टि से तादाम्य स्थापित करने की प्राणेर व्यथा या अकुलाहट
या कहीं बहुत कुछ व्यक्त रह जाने की छटपटाहट जो टुकड़ों टुकड़ों में अभिव्यक्त होती जाए
क्या है कविता आराधन ?
और आपकी आज की कविता इन मानदंडों पर खरी उतरती है -बहुत बधाई!
आप से ऐसी ही सशक्त रचनाओं की आशा सदैव रहेगी ....ताकि मैं भी उन पर इत्ता सा लिख सकूं कुछ -थोड़ी आनंदानुभूति कर सकूं !
.
*अव्यक्त रह जाने की छटपटाहट
ऐसा नहीं है कि उन्हें
नए शब्दों के उगने का पता नहीं चलता,
वे कुचल देना चाहते हैं उन्हें
मजबूत बनने से पहले.
बावजूद इसके
उनके पिरामिड में सदियों से नीचे पड़े शब्द
मचल रहे हैं,
उन्हें नहीं पता कि अब
शब्द खुद अपने अर्थ बदल रहे हैं.
बहुत अच्छी रचना है.
बावजूद इसके
उनके पिरामिड में सदियों से नीचे पड़े शब्द
मचल रहे हैं,
उन्हें नहीं पता कि अब
शब्द खुद अपने अर्थ बदल रहे हैं
बहुत कुछ कहने की छटपटाहट दे रहे हैं यह शब्द ...अच्छी प्रस्तुति
ऐसा नहीं है कि उन्हें
नए शब्दों के उगने का पता नहीं चलता,
वे कुचल देना चाहते हैं उन्हें
मजबूत बनने से पहले.
bahut badee baat ...
bahut hee sahi aur sateek baat... shabdo ke matlab badal jatey hai..
ucchstariy kavita..bahut sundar
aapki kavita me aik bhaav samaan chalta aaya hai..kahi bhi vah idhar udhar hili nahi... aur bahut teekha karara vyang hai .. aur badee urja hai kavita me... badhai.
yu have strong wordpower..i m fond of yr pen..keep going aradhana!
taakatvar lekhan...isi tarah awaaz aur parvaaz mile is soch ko
really very nice and wish u a happy diwali and happy new year
शब्द उग रहे हैं, नये विचार उग रहे हैं किन्तु कुछ लोग उन्हें खतपतवार की तरह उखाड़ फ़ेंकना चाहते हैं। बहुत सही कविता है।
घुघूती बासूती
अच्छी कविता है और पिरामिड के बिम्ब का बेहतरीन इस्तेमाल है ।
शब्द खुद अपने अर्थ बदल रहे हैं.... निश्चय ही
bahut sundar kavita badhai
कुछ ख़ास नहीं,बस नारी होने के नाते जो झेला और महसूस किया ,उसे शब्दों में ढालने का प्रयास कर रही हूँ.चाह है, दुनिया औरतों के लिए बेहतर और सुरक्षित बने .
aap ne atchha likha hai, magar ek bat kanena chahuga, दुनिया औरतों के लिए बेहतर और सुरक्षित banane ke liye ek female ko bhi apni soch badlani hogi, tab jeke ye mumkin ho payega.
आराधना जी आपका blog पेहली बार पढा और सुरु से लेकर अंत तक पढ गया | में कोई अत्चा साब्दाकर तो नही क्योंकी मी साहित्य का चात्र नही | इसलिये सारी कविता पर मैने टिप्पणी नही दी | पर मुझे ऐसा मेहसूस हुअ कि आपकी लिखी हुई सारी कविता आपके दिल कि आवाज है जो मुझे साफ - साफ सुनाई दे रही थी जब मी कविता पढ रहा था, और ये टिप्पणी उस पाक - साफ और सहज अभिव्यक्ती को सलाम हें | ये सलाम है आपके उस ब्लोग को जहां कविता पोस्ट कर रही hain किसी पुरस्कार या royelty के लिये नही बल्की अपनी रचना से लोगो के दिलो को छुने के लिये | आपके मुक्ती के सपने को मेरा सलाम |
एक सहज रचना है...
फलो या बहाव भी सहज, विघ्न विहीन...
नए शब्दों के साथ उन्हें भी ढूंढना है
जो नारी की साहजिकता को मलीन करे
और ढाले उसे अपने विकारों में...सिमोन द बऊआर
ने कहीं लिखा है, स्त्री को औरत सआयास बनाया जाता है...आज भी सीरियल में, फिल्मों में स्त्री को शब्दों के जाल में फंसया जाता है ताकी वे अपनी इच्छा के विरुद्ध कोई अनचाहानिर्णय या रास्ता पसंद करे...और पुरुष की विजय स्थापित करे...
अरविन्द मिश्र जी की टिप्पणी... कि कविता का क्या फोरम हो ? उनके बताए पैमाने भी पसंद आए...
अरसे बाद तुम्हारी लिखी कोई अच्छी कविता पढ़ी. शायद सन 2000 के बाद पहली अच्छी कविता जब उस गर्म दोपहर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में साइकोलाजी के सामने से संस्कृत डिपार्टमेंट जाती हुई तुमको रोककर अपनी दीवार पत्रिका के लिए कुछ माँगा था, और फिर तुमने एक बहुत ही अच्छी और सघन कविता दी थी, व्यवस्था पर कुछ टिप्पणी सी. तब से अब तक तुम्हारी तमाम कविताओं से एक ही दिक्कत रही, शब्दों के बेतरतीब इस्तेमाल के साथ साथ संपादन से तुम्हारा भागना.
यह भी कि तुम्हारी कवितायें लेखों सी लगती रहीं, ऐसे लेखों सी जो तुमने कभी लिखे नहीं बावजूद इसके कीव आह जरूरी थे. यह कविता पढ़ के मगर बहुत अच्छा लगा, एक सघन, भावप्रवण कविता के साथ साथ नए बिम्बों के प्रभाव सा..
हाँ अगले लेख का इन्तेजार है.. और ऐसी हो तो कविता का भी..
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