बृहस्पतिवार, 26 नवम्बर 2009

मेरी बच्ची

तुझे दूँगी वो सारी खुशियाँ
जो मुझे नहीं मिलीं
तेरी ज़िन्दगी को
ऐसे मैं संवारुँगी
तुझे रखूँगी
पलकों की छाँव में
ग़म की हर धूप से
बचा लूँगी
कैसे बचाउँगी
शैतानों की नज़रों से तुझे
अभी से सोचकर
डर लगता है
कि मेरी ही तरह तुझे भी
जाने क्या-क्या सहना होगा
पर अपनी पहचान बनाने के लिये
मेरी बच्ची
तुझे खुद ही लड़ना होगा
ज़िन्दगी की
कड़वी सच्चाइयाँ
रुलायेंगी तुझे
पर वे ही मुझ जैसा
मजबूत बनायेंगी तुझे

7 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari ने कहा…

मेरी बच्ची
तुझे खुद ही लड़ना होगा
ज़िन्दगी की
कड़वी सच्चाइयाँ
रुलायेंगी तुझे
पर वे ही मुझ जैसा
मजबूत बनायेंगी तुझे

-बहुत सार्थक!!

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

"ज़िन्दगी की
कड़वी सच्चाइयाँ
रुलायेंगी तुझे
पर वे ही मुझ जैसा
मजबूत बनायेंगी तुझे। "
-यही तो है जीवन का सम्पूर्ण सारांश । रचना का आभार ।

वाणी गीत ने कहा…

यही तो कहना चाहती है हर माँ अपनी बेटियों से ....
सुन्दर रचना ...!!

Mithilesh dubey ने कहा…

बहुत खूब आराधना दीदी । काश आप जैसे हौंसले और जज्बात सबके पास होते । लाजवाब कविता लगी आपकी

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

सुन्दर विचार ...
संघर्ष - प्रियता और संकल्प ...
उच्च मनोभूमि ...

Arvind Mishra ने कहा…

जी यही विचार तो मेरे भी अपनी बिटिया के लिए उठ रहे है इन दिनों -अद्भुत विचार साम्य और साहचर्य !

boletobindas ने कहा…

पर अपनी पहचान बनाने के लिये
मेरी बच्ची
तुझे खुद ही लड़ना होगा
ज़िन्दगी की
कड़वी सच्चाइयाँ
रुलायेंगी तुझे
पर वे ही मुझ जैसा
मजबूत बनायेंगी तुझे

ladna hi hoga dunia se..tabhi apni pahchaan baan payegi....sade gale purne manyaato se chutkhaara paana hi hoga...